नई दिल्ली: इराक आज ऐसी आग में झुलस रहा है जो उसकी अपनी नहीं है. एक ओर ईरान समर्थित लड़ाके अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहे हैं, तो दूसरी ओर अमेरिका इराकी जमीन पर ही पलटवार कर रहा है. फरवरी के अंत से शुरू हुआ यह टकराव अब बगदाद और इरबिल जैसे मुख्य शहरों तक पहुंच चुका है. आसमान में गूंजते ड्रोनों ने आम नागरिकों के मन में खौफ और भविष्य को लेकर गहरी असुरक्षा पैदा कर दी है.
बगदाद और इरबिल में शांति अब गायब हो गई है. अमेरिकी अड्डों पर ड्रोन हमले सामान्य हो गए हैं. बाजारों के पास बमबारी ने व्यापार ठप कर दिया है. लोग चाय पीते समय भी धमाकों से डर जाते हैं. इस अघोषित युद्ध में आम जनता और नागरिक बुनियादी ढांचे सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.
इराक की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल पर टिकी है. खाड़ी में जारी हमलों के कारण निर्यात लगभग ठप हो गया है. कुर्द सरकार ने आगाह किया है कि तेल निकासी शुरू न होने पर कर्मचारियों को वेतन देना असंभव होगा. हजारों परिवार सरकारी नौकरियों पर निर्भर हैं. भुगतान रुकने से सड़कों पर प्रदर्शन और अशांति का खतरा है.
अमेरिकी सेना और मिलिशिया की झड़पें अब शहरों तक आ गई हैं. जुरफ अल-सखर और अल-काइम में भारी बमबारी जारी है. सरकार के विरोध के बावजूद उसकी सरजमीं को युद्ध का मैदान बनाया जा रहा है. बाहरी टकराव पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रहा, जिससे हालात पूरी तरह बेकाबू होते जा रहे हैं.
देश की अंतरिम सरकार इस भारी सुरक्षा दबाव को संभालने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है. प्रधानमंत्री सुदानी के पास सशस्त्र समूहों को रोकने की पर्याप्त शक्ति नहीं है. राजनीतिक मोर्चे पर इस कमजोरी का लाभ उठाकर मिलिशिया समूह सरकारी व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं. सरकार की यह बेबसी देश को पुरानी अराजकता की ओर धकेल रही है.
विशेषज्ञों के अनुसार यह टकराव इराक की मेहनत से हासिल स्थिरता को खत्म कर देगा. आर्थिक मंदी और उथल-पुथल देश को विनाश की ओर ले जा सकते हैं. इराकी नागरिक केवल शांति चाहते हैं, लेकिन उन्हें भविष्य में केवल ड्रोन और डर ही नजर आ रहा है. इराक का भविष्य अब दांव पर है.