मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका, इजरायल और लेबनान एक नए त्रिपक्षीय समझौते के करीब पहुंचे हैं. इस पहल को क्षेत्र में हिंसा कम करने और स्थायी शांति की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. अमेरिका ने समझौते के साथ आर्थिक और मानवीय सहायता का भी ऐलान किया है. हालांकि, समझौते के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह बनकर उभरा है. संगठन ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है और साफ कहा है कि वह किसी भी स्थिति में अपने हथियार नहीं छोड़ेगा. इससे पूरे समझौते के भविष्य पर अनिश्चितता बढ़ गई है.
अमेरिका, इजरायल और लेबनान के प्रतिनिधियों के बीच शुक्रवार को त्रिपक्षीय फ्रेमवर्क समझौते पर सहमति बनी. इस पर लेबनान की राजदूत नादा मुआवद, इजरायल के राजदूत येचिएल लीटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए. हालांकि, समझौते की विस्तृत शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसे सीमा पर जारी संघर्ष कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते को कठिन लेकिन जरूरी शुरुआत बताया. उन्होंने घोषणा की कि संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से लेबनान को तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता दी जाएगी. इसके अलावा, 3 करोड़ डॉलर से अधिक की राशि लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और देश में सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए उपलब्ध कराई जाएगी.
समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट जोन बनाए जाएंगे. इन इलाकों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी. इजरायल ने स्पष्ट किया है कि आगे की वापसी इस बात पर निर्भर करेगी कि हिज्बुल्लाह अपने सैन्य ढांचे को खत्म करता है या नहीं.
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि सेना की वापसी प्रदर्शन आधारित होगी और हिज्बुल्लाह के निशस्त्रीकरण के बाद ही आगे बढ़ेगी. वहीं लेबनान की राजदूत नादा मुआवद ने इसे शांति प्रक्रिया की शुरुआत बताया. राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने कहा कि इस पहल से विस्थापित नागरिकों की घर वापसी का रास्ता खुलेगा, लेकिन देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा.
समझौते के ऐलान के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसे खारिज कर दिया. संगठन के नेता फदलल्लाह ने कहा कि लेबनानी सरकार इस समझौते को लागू नहीं कर सकती और संगठन किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि निशस्त्रीकरण की कोशिश हुई तो उसका कड़ा विरोध किया जाएगा. ऐसे में शांति समझौते की सफलता अब काफी हद तक हिज्बुल्लाह के रुख पर निर्भर मानी जा रही है.