US Tariff Dispute: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने टैरिफ वॉर का जोरदार बचाव किया है. यह बयान ऐसे समय आया जब अमेरिका की अपील अदालत ने 7-4 के फैसले में कहा कि ट्रंप द्वारा लगाए गए ज्यादातर व्यापक टैरिफ International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत वैध नहीं हैं. अदालत का मानना है कि संविधान के अनुसार कर और टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास. हालांकि अदालत ने अपना आदेश 14 अक्टूबर तक रोके रखा है ताकि सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सके.
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर अदालत के फैसले की आलोचना करते हुए लिखा कि बिना टैरिफ के हमारा देश पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा और हमारी सैन्य शक्ति तुरंत नष्ट हो जाएगी. उन्होंने अदालत के उन एकमात्र डेमोक्रेट न्यायाधीश को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि ओबामा द्वारा नियुक्त एक डेमोक्रेट ने वास्तव में हमारे देश को बचाने के लिए मतदान किया. उनके साहस के लिए मैं उनका धन्यवाद करना चाहता हूं. जिन्होंने उनके पक्ष में राय दी. ट्रंप ने कहा कि सभी टैरिफ अभी भी प्रभावी हैं और अगर उन्हें हटा दिया गया तो यह देश के लिए आपदा होगी.
यह मामला मुख्य रूप से दो सेट के टैरिफ पर केंद्रित था. पहला अप्रैल में घोषित प्रतिकारी टैरिफ और दूसरा फरवरी में चीन, कनाडा और मेक्सिको पर लगाया गया पैकेज. ये मिलकर करीब 69 प्रतिशत अमेरिकी आयात को प्रभावित करते थे. अदालत के आदेश के बाद यह कवरेज घटकर करीब 16 प्रतिशत तक रह जाएगा. जबकि Section 232 के तहत लगाए गए स्टील और एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रीय टैरिफ इस फैसले से कोई असर नहीं पड़ा है और वे लागू रहेंगे. वाणिज्य विभाग ने इन्हें और बढ़ाते हुए 400 से अधिक उत्पाद श्रेणियों पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाया है.
ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने अदालत के बहुमत को 'काले गाउन में राजनेता करार' दिया और कहा कि अगर टैरिफ खत्म होते हैं तो यह अमेरिका के अंत जैसा होगा. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि Section 232 के तहत लगाए गए टैरिफ अदालत में चुनौती से बच सकते हैं और आगे भी जारी रह सकते हैं.
यह याचिका डेमोक्रेट राज्यों और छोटे आयातकों के समूह ने दायर की थी. उनका तर्क था कि IEEPA राष्ट्रपति को इस तरह का व्यापक टैरिफ लगाने की अनुमति नहीं देता. अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है. अगर वहां से भी सरकार को राहत नहीं मिलती तो अधिकांश टैरिफ हटाने पड़ेंगे. इस बीच अमेरिका के कई सहयोगी देशों को नए समझौते करने पड़े हैं, जबकि भारत जैसे देशों पर 50 प्रतिशत तक भारी शुल्क लगाया गया है. वर्तमान में आयातक और निर्माता अदालत के अंतिम फैसले तक असमंजस की स्थिति में हैं.