नई दिल्ली: ईरान की राजनीति में अली लारिजानी का नाम सिर्फ एक नेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक संतुलन बनाने वाले चेहरे के रूप में लिया जाता था. इजरायली हमले में उनकी मौत ने उस संतुलन को तोड़ दिया है, जो वर्षों से सत्ता, सेना और कूटनीति के बीच बना हुआ था. ऐसे समय में जब देश पहले से ही तनाव और युद्ध के दौर से गुजर रहा है, लारिजानी का जाना ईरान के लिए एक गहरा झटका माना जा रहा है.
लारिजानी उन गिने-चुने नेताओं में थे जो एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय रहते थे. उनका प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि सुरक्षा और विदेश नीति तक फैला हुआ था. आईआरजीसी से उनके करीबी संबंध थे, वहीं वे कूटनीतिक बातचीत में भी उतने ही मजबूत माने जाते थे. यही वजह थी कि संकट के समय उन्हें सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिना जाता था.
ईरान की राजनीति में अक्सर कट्टरपंथी और सुधारवादी धड़े आमने-सामने रहते हैं, लेकिन लारिजानी इन दोनों के बीच एक पुल की तरह काम करते थे. वे दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य थे, जो उन्हें खास बनाता था. यही संतुलन उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता था. उनके रहते संवाद और समझौते की संभावना बनी रहती थी, जो अब कमजोर पड़ती दिख रही है.
परमाणु नीति के क्षेत्र में भी लारिजानी की भूमिका बेहद अहम रही. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान का पक्ष मजबूती से रखा और पश्चिमी देशों के दबाव का सामना किया. डोनाल्ड ट्रंप के दौर में भी उन्होंने कूटनीतिक रास्तों को खुला रखने की कोशिश की. वे मानते थे कि बातचीत के जरिए ही लंबे समय तक स्थिरता हासिल की जा सकती है.
लारिजानी को मोजतबा खामनेई के संभावित सुप्रीम लीडर बनने का विरोधी माना जाता था. उन्होंने इस प्रक्रिया को टालने की कोशिश भी की थी. उनके साथ हसन रूहानी जैसे नेता भी थे, जो जल्दबाजी में फैसले लेने के खिलाफ थे. इससे साफ होता है कि वे सिर्फ सत्ता का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी दिशा तय करने की कोशिश भी करते थे.
लारिजानी केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक गहरे विचारक भी थे. दर्शनशास्त्र में उनकी गहरी पकड़ थी और वे इस्लामी विचारधारा को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करते थे. उनकी सोच में समाज और सत्ता के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर था. यही कारण था कि वे हर फैसले को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक नजरिए से भी देखते थे.
उनकी मौत के बाद ईरान में एक बड़ा राजनीतिक खालीपन नजर आ रहा है. ऐसे नेता कम ही होते हैं जो अलग-अलग ताकतों के बीच संतुलन बना सकें. अब आशंका जताई जा रही है कि कट्टरपंथी ताकतें और मजबूत हो सकती हैं. इससे देश की राजनीति अधिक आक्रामक और टकरावपूर्ण दिशा में जा सकती है, जहां संवाद की संभावना कम होती चली जाएगी.