नई दिल्ली: आठ मुस्लिम-बहुसंख्यक देशों के विदेश मंत्रियों ने पुष्टि कर बताया है कि उनकी सरकारें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होंगी. यह कदम अमेरिका द्वारा किए जा रहे शांति प्रयास के लिए मजबूत सपोर्ट दिखाता है. बता दें कि जो देश शामिल होने के लिए सहमत हुए हैं, उनमें कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं.
एक ज्वाइंट स्टेटमेंट में, उनके विदेश मंत्रियों ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप के निमंत्रण का स्वागत करते हुए बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा बनने का संयुक्त फैसला किया. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि बोर्ड में आधिकारिक तौर पर शामिल होने से पहले हर देश अपनी कानूनी और राजनीतिक प्रक्रियाएं पूरी करेगा. मिस्र, पाकिस्तान और यूएई पहले ही कह चुके थे कि वे इसमें हिस्सा लेने की योजना बना रहे हैं.
बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने को लेकर मंत्रियों ने कहा कि वो राष्ट्रपति ट्रंप के शांति प्रयासों का सपोर्ट करते हैं और बोर्ड के काम को पूरा करने में मदद करने के लिए तैयार हैं. उनके अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस एक टेम्पररी गवर्निंग बॉडी के तौर पर काम करेगा, जिसका उद्देश्य गाजा में युद्ध खत्म करना होगा. यह प्लान परमानेंटली सीजफायर लागू करने, गाजा के पुनर्निर्माण में मदद करने समेत निष्पक्ष और स्थायी शांति की ओर बढ़ने पर केंद्रित है.
बता दें कि यह प्रस्ताव हर किसी ने स्वीकार नहीं किया है. कई यूरोपीय देश इस विचार पर बंटे हुए हैं. फ्रांस ने इसे पहले ही मना कर दिया है. इसके कास थ ही नॉर्वे और स्वीडन ने भी इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है. एक नॉर्वेजियन अधिकारी ने कहा कि यह प्रस्ताव कई सवाल खड़े करता है और अमेरिका के साथ और चर्चा की जरूरत है. वहीं, स्वीडन के प्रधानमंत्री ने कहा कि देश अपने मौजूदा स्वरूप में इस योजना से सहमत नहीं हो सकता.
स्लोवेनिया ने भी अपना फैसला टाल दिया है. इसके प्रधानमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बोर्ड की पावर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आसपास बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर सकती हैं. इस बीच, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, यूरोपीय संघ, रूस, यूक्रेन और चीन जैसे देशों ने अभी तक यह नहीं बताया है कि वे शामिल होंगे या नहीं. इटली की प्रधानमंत्री ने भी कहा कि उन्हें प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए और समय चाहिए.