किसी के लिए किताबें शौक होती हैं, किसी के लिए पेशा, लेकिन न्यूयॉर्क के युवा यहूदी लेखक और शोधकर्ता मेंडल उमिनर (Mendel Uminer) के लिए किताबें जीवन का आधार हैं. 31 वर्षीय उमिनर ने जब मैनहट्टन के अपर ईस्ट साइड में सेंट्रल पार्क के पास 600 वर्गफुट का स्टूडियो अपार्टमेंट किराए पर लिया, तो अपने साथ कपड़ों या फर्नीचर से ज्यादा अहम चीज लेकर आए- करीब 10 हजार किताबें. देखते ही देखते उनका छोटा-सा फ्लैट एक निजी पुस्तकालय में बदल गया, जहां दीवारों से लेकर बाथरूम तक किताबों के ढेर नजर आते थे. लेकिन यही जुनून आगे चलकर उनके लिए बेघर होने की वजह बन गया.
उमिनर का घर किसी सामान्य अपार्टमेंट जैसा नहीं था. दीवारों के साथ यहूदी इतिहास और संस्कृति पर आधारित किताबों के ऊंचे ढेर लगे थे. बाथरूम में फिल्म समीक्षा और ओपेरा के इतिहास की किताबें रखी थीं, जबकि खिड़कियों के सामने नाटक और कविता संग्रहों के ढेर थे. वह फर्श पर गद्दा बिछाकर सोते थे और चारों ओर किताबों से घिरे रहते थे.
उनका कहना है कि वे हर दिन घंटों पढ़ते हैं. उनके मुताबिक, हर किताब किसी न किसी ज्ञान का स्रोत है और उनकी निजी लाइब्रेरी ही उनके जीवन का मार्गदर्शक है. उनका मानना है कि यदि किसी विषय पर राय बनानी है, तो उससे सहमत और असहमत दोनों तरह की किताबें पढ़ना जरूरी है.
उमिनर फ्रीलांस हिब्रू अनुवादक के रूप में काम करते हैं और उन्होंने 'नोटारिकॉन रिव्यू' (Notarikon Review) नाम से एक साहित्यिक पत्रिका भी शुरू की है. उनका यही फ्लैट युवा लेखकों, शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों का अड्डा बन गया था.
यहां अक्सर बीयर के साथ साहित्य, राजनीति, दर्शन, ग्रीक कविता और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर लंबी बहसें होती थीं. न्यूयॉर्क के कई युवा लेखक इस छोटे से फ्लैट में जुटते और घंटों विचारों का आदान-प्रदान करते. उमिनर का सपना था कि यहीं से एक ऐसी साहित्यिक पत्रिका निकले, जिसमें अलग-अलग विचारधाराओं के लेखक बिना किसी वैचारिक बंधन के लिख सकें.
समस्या तब शुरू हुई जब अपार्टमेंट प्रबंधन ने उन्हें नोटिस भेजा. नोटिस में कहा गया कि फ्लैट में जरूरत से ज्यादा किताबें जमा कर दी गई हैं, जिससे गंभीर अग्नि जोखिम पैदा हो गया है. भवन प्रबंधन ने इसे किरायेदारी की शर्तों का उल्लंघन बताया और चेतावनी दी कि यदि किताबों की संख्या कम नहीं की गई तो उन्हें फ्लैट खाली करना होगा.
उमिनर के लिए यह झटका था. उनका कहना था कि जिन किताबों को वे ज्ञान का खजाना मानते हैं, उन्हीं को अब खतरे के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने शुरुआत में इस चेतावनी को नजरअंदाज किया, जिसके बाद उनके खिलाफ बेदखली की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई.
उमिनर ने अदालत में अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी. उनका तर्क था कि किताबें उनके जीवन, पेशे और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं. हालांकि कई महीनों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद उन्होंने अंततः फ्लैट छोड़ने का फैसला कर लिया.
उन्होंने कहा कि यदि किसी जगह उन्हें स्वीकार नहीं किया जा रहा, तो वहां रहने का कोई अर्थ नहीं है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि वे अपनी किताबों से समझौता नहीं करेंगे और नई जगह पर भी अपनी लाइब्रेरी को साथ ले जाएंगे.
मेंडल उमिनर का बचपन न्यूयॉर्क के क्राउन हाइट्स स्थित एक पारंपरिक यहूदी धार्मिक समुदाय में बीता. घर में यिडिश भाषा बोली जाती थी और परिवार धार्मिक शिक्षा से जुड़ा था. उनके पिता चाहते थे कि बेटा धार्मिक विद्वान बने, लेकिन कम उम्र से ही उमिनर की रुचि साहित्य की ओर बढ़ने लगी.
सिर्फ 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने रूसी लेखक दोस्तोयेव्स्की को पढ़ना शुरू कर दिया. किशोरावस्था में उन्होंने रब्बी प्रशिक्षण संस्थान में पढ़ाई की, जहां अरामाइक, हिब्रू और यिडिश भाषाओं के धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया. लेकिन साथ ही वे चुपके-चुपके आधुनिक साहित्य भी पढ़ते रहे. उनका कहना है कि अलग-अलग विचारों को पढ़े बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होता.
20 वर्ष की उम्र के बाद उमिनर का झुकाव आधुनिक दर्शन और विश्व साहित्य की ओर बढ़ता गया. उन्होंने रब्बी बनने का रास्ता छोड़ दिया और कोलंबिया विश्वविद्यालय में फिल्म और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई शुरू की.
पढ़ाई के बाद वे कुछ समय पेरिस भी रहे, जहां उन्होंने फ्रांसीसी साहित्यिक पत्रिकाओं और बौद्धिक विमर्श को करीब से देखा. उनका मानना है कि फ्रांस की साहित्यिक संस्कृति ने उन्हें स्वतंत्र सोचने और विवादास्पद विषयों पर गंभीर बहस करने की प्रेरणा दी. इसी अनुभव ने उन्हें अपनी साहित्यिक पत्रिका शुरू करने का विचार दिया.
उमिनर के मित्रों और पुस्तक विक्रेताओं का मानना है कि उन्हें गलत समझा गया. उनके करीबी दोस्त और फिल्म निर्माता जूलियन कॉस्मा का कहना है कि आज का न्यूयॉर्क पहले जैसा नहीं रहा. अब शहर में अलग तरह के लोगों और असामान्य जीवनशैली के लिए जगह कम होती जा रही है.
ब्रुकलिन के पुस्तक विक्रेता इसराइल मिजराही का कहना है कि यहूदी संस्कृति में किताबें केवल पढ़ने की वस्तु नहीं बल्कि पहचान का हिस्सा होती हैं. उनके मुताबिक, उमिनर की लाइब्रेरी अव्यवस्थित जरूर दिख सकती है, लेकिन उन्हें हर किताब की जगह याद रहती है. उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी किताबें हैं, तो यह शायद सबसे कम खतरनाक कमजोरी होगी.
जब फ्लैट खाली करने का दिन आया तो कई दोस्त उनकी मदद के लिए पहुंचे. हजारों किताबों को डिब्बों में पैक किया गया. तेज बारिश के बीच सभी लोग किताबों के बक्से उठाकर वैन तक ले जाते रहे. कमरे की दीवारें धीरे-धीरे खाली होती गईं, लेकिन माहौल उदास होने के बजाय बहसों और साहित्यिक चर्चाओं से भरा रहा.
रात को दोस्तों ने साथ बैठकर रूसी कविता, फ्रांसीसी साहित्य और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर चर्चा की. इसी दौरान उमिनर को नई उम्मीद भी मिली, क्योंकि उन्हें पहले से बड़ा अपार्टमेंट मिल चुका था. उनकी एक मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा, "अगर नया घर बड़ा है, तो इसका मतलब है कि अब वहां और ज्यादा किताबें जाएंगी."
मेंडल उमिनर की कहानी केवल एक व्यक्ति और उसकी किताबों की नहीं है. यह सवाल भी उठाती है कि आधुनिक शहरों में सुरक्षा नियमों और व्यक्तिगत बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. जहां भवन प्रबंधन आग से सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, वहीं उमिनर जैसे लोगों के लिए किताबें केवल कागज के पन्ने नहीं बल्कि संस्कृति, विचार और जीवन की पूंजी हैं.
फ्लैट बदल गया, पता बदल गया, लेकिन उमिनर का विश्वास नहीं बदला. उनका कहना है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत सीखते रहना है, और जब तक किताबें साथ हैं, तब तक उनका असली घर भी उनके साथ ही रहेगा.