menu-icon
India Daily

ईरान में गृह युद्ध! बढ़ते तनाव के पीछे अमेरिका-इजरायल की भूमिका तो नहीं?

बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने आम लोगों की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया है. ईरानी मुद्रा की कीमत लगातार गिर रही है और विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है.

Anuj
Edited By: Anuj
ईरान में गृह युद्ध! बढ़ते तनाव के पीछे अमेरिका-इजरायल की भूमिका तो नहीं?

नई दिल्ली: ईरान इस समय अपने अब तक के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. बीते एक हफ्ते से देशभर से जो हालात सामने आ रहे हैं, वे यह साफ संकेत दे रहे हैं कि यह सिर्फ किसी एक शहर या समूह का विरोध नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैला गहरा असंतोष है. लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं और सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी सीधे तौर पर सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को चुनौती दे रहे हैं और मौजूदा शासन व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं. ऐसे हालात में यह सवाल उठने लगा है कि क्या 2026 की शुरुआत में ईरान किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ रहा है.

ईरान में तनाव

रिपोर्ट के अनुसार, लगातार बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने आम लोगों की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया है. रोजमर्रा की जरूरत की चीजें भी लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं. ईरानी मुद्रा की कीमत लगातार गिर रही है और विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. इसी आर्थिक दबाव ने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है.

राजधानी तेहरान से हुई आंदोलन की शुरूआत

इस आंदोलन की शुरुआत 28 दिसंबर को राजधानी तेहरान से हुई थी. पहले दुकानदारों और व्यापारियों ने महंगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई. लेकिन कुछ ही दिनों में यह विरोध पूरे देश में फैल गया. अब यह सिर्फ व्यापारियों तक सीमित नहीं है. कॉलेज और विश्वविद्यालयों के छात्र भी बड़ी संख्या में इसमें शामिल हो चुके हैं. खास तौर पर युवा पीढ़ी, जिसे रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता सता रही है, इस आंदोलन की अहम ताकत बनकर उभरी है.

प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी

इन प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है. सख्त सामाजिक नियमों वाले ईरान में महिलाओं का इस तरह खुलकर विरोध करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. हालात को काबू में करने के लिए सुरक्षा बलों ने सख्ती दिखाई है. कई जगहों पर लाठीचार्ज, गिरफ्तारियां और झड़पों की खबरें सामने आई हैं. हिंसा की घटनाओं में अब तक कई लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है. इसके बावजूद आंदोलन थमने के बजाय और तेज होता जा रहा है. 25 से ज्यादा प्रांतों में लोग खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं.

अमेरिका-इजरायल की भूमिका

इस बीच अमेरिका की भूमिका ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि अगर प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार जारी रहा, तो अमेरिका कार्रवाई कर सकता है. इससे एक तरफ प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर ईरानी सरकार और ज्यादा सख्त हो गई है. ईरान ने अमेरिका पर आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया है.

हालात तब और गंभीर हो जाते हैं, जब इजरायल की भूमिका सामने आती है. खबरों के मुताबिक, इजरायल ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कदमों को लेकर तैयारी तेज कर दी है. इजरायली नेतृत्व ने खुले तौर पर ईरान में हो रहे सत्ता विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया है. इससे तेहरान में खतरे की आशंका और गहरी हो गई है.

दोहरे संकट में ईरान सरकार

एक तरफ देश के भीतर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं और दूसरी तरफ बाहरी दबाव बढ़ता जा रहा है. ईरान ने अपनी सेना और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के दावे जरूर किए हैं, लेकिन अंदरूनी अस्थिरता ने उसकी स्थिति कमजोर कर दी है. 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए आंदोलनों के बाद यह सबसे बड़ा जनउभार माना जा रहा है. फर्क बस इतना है कि इस बार मुद्दा सिर्फ आजादी का नहीं, बल्कि आर्थिक अस्तित्व और सत्ता के भविष्य का है. अब देखना यह है कि ईरान की मौजूदा सत्ता इस दोहरे संकट से कैसे निपटती है.