मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का विरोध तेज हो गया है. SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष लगातार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है. मंगलवार को विपक्षी दलों ने मार्च निकाला और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की. पुलिस द्वारा मार्च रोके जाने के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेता आकाशवाणी भवन परिसर में कई घंटे तक धरने पर बैठे रहे.
प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी के हाथ में 'ज्ञानेश इट्स डन ब्रो' लिखा पोस्टर भी दिखाई दिया. विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. राहुल गांधी ने इसे केवल प्रशासनिक मुद्दा न बताते हुए लोकतंत्र और वोट के अधिकार से जुड़ा मामला बताया है.
हालांकि, ज्ञानेश कुमार की ओर से अभी इस्तीफे की मांग पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं देते हैं तो विपक्ष के पास आगे कौन से रास्ते बचते हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त को सामान्य राजनीतिक दबाव के आधार पर पद से हटाया नहीं जा सकता. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी है. इसके लिए संसद में विशेष प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है.
लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद हस्ताक्षरित नोटिस देकर हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं. इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत आरोपों की जांच होती है. जांच में गंभीर कदाचार या अक्षमता साबित होने और दोनों सदनों में विशेष बहुमत मिलने के बाद ही हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है.
विपक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है. अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के कथित उल्लंघन को लेकर याचिका दायर की जा सकती है. इसमें मतदाता सूची से नाम हटाने, SIR की प्रक्रिया या चुनावी नियमों में कथित अनियमितताओं को चुनौती दी जा सकती है.
विपक्ष अदालत से अंतरिम राहत की मांग भी कर सकता है. हालांकि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को काम करने से रोकने जैसी राहत अदालत तथ्यों और कानूनी आधार की जांच के बाद ही तय करेगी.
विपक्ष चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को भी चुनौती देने का रास्ता अपना सकता है. इस कानून में नियुक्ति संबंधी चयन समिति की संरचना में बदलाव किया गया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया.
विपक्ष का तर्क हो सकता है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों का हिस्सा है. इसी आधार पर नियुक्ति व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाए जा सकते हैं.
विपक्ष चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप का मुद्दा भी उठा सकता है. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त चुनावी मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
यदि विपक्ष का आरोप है कि किसी फैसले में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद एकतरफा निर्णय लिया गया, तो वह न्यायिक समीक्षा की मांग कर सकता है. हालांकि किसी फैसले को गैर-कानूनी घोषित करने के लिए ठोस तथ्य और संबंधित कानूनी प्रावधानों का आधार जरूरी होगा.
मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मामलों में राज्य स्तर पर हाई कोर्ट का रास्ता भी खुला है. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और संबंधित चुनावी नियमों के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया तय है.
यदि किसी राज्य में यह आरोप लगाया जाता है कि मतदाताओं के नाम निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना हटाए गए हैं, तो प्रभावित पक्ष या राजनीतिक दल हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर सकते हैं. अदालत प्रक्रिया में गंभीर खामी पाए जाने पर संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई की समीक्षा कर सकती है.
कानूनी विकल्पों के अलावा विपक्ष के पास राजनीतिक आंदोलन का रास्ता भी है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों समेत गैर-बीजेपी दल इस मुद्दे पर साझा अभियान चला सकते हैं. रैलियों, संसद में विरोध और जनसभाओं के जरिए इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश हो सकती है.