नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते ने वैश्विक स्तर पर राहत का माहौल बनाया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की घोषणा के बाद ऊर्जा बाजारों में तुरंत असर दिखाई देने लगा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है. इस घटनाक्रम को भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है.
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद तेल आपूर्ति को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ गई थी. होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक बाजारों पर दबाव बना. अब समझौते के बाद तेल की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद जगी है. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट देखी गई है, जिससे आयातक देशों को राहत मिल सकती है.
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमत कम होने का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है. पेट्रोल और डीजल की लागत घटने से परिवहन खर्च कम होगा. इसका लाभ खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है. इससे महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है.
ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने से रसोई गैस और अन्य गैस उत्पादों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है. यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट जारी रहती है तो तेल विपणन कंपनियों पर दबाव कम होगा. इससे उपभोक्ताओं को भविष्य में कीमतों के मोर्चे पर राहत मिलने की संभावना बढ़ सकती है. उद्योग जगत को भी इसका लाभ मिलेगा.
वैश्विक तनाव कम होने का असर वित्तीय बाजारों पर भी देखने को मिला है. तेल की कीमतों में गिरावट से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है. इसके चलते भारतीय शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है. वहीं आयात बिल कम होने की संभावना से भारतीय रुपये पर दबाव घटेगा, जिससे मुद्रा को मजबूती मिलने में मदद मिल सकती है.
खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं. क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने उनकी सुरक्षा और रोजगार को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थीं. शांति समझौते के बाद हालात स्थिर होने की उम्मीद है. इससे वहां रह रहे भारतीयों के लिए अनिश्चितता कम होगी और आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिल सकती है.