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पांडियन की तकदीर, कांग्रेस की तस्वीर...ये 5 अहम फैसले करेगा ओडिशा के लोकसभा-विधानसभा चुनाव का परिणाम

ओडिशा में इस बार विधानसभा की 147 सीटों और लोकसभा की सीटों के लिए 13 से 1 जून के बीच मतदान हुआ था. ओडिशा के लोकसभा चुनाव में इस बार भाजपा को भारी बढ़त मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.

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Odisha
Courtesy: social media

Odisha News: मंगलवार (4 जून) का दिन न केवल केंद्र के लिए बल्कि ओडिशा के लिए भी ऐतिहासिक होने जा रहा है, क्योंकि इसी दिन ओडिशा विधानसभा चुनाव के नतीजे भी जारी होंगे. ज्यादातर एग्जिट पोल दावा कर रहे हैं कि राज्य की सभी 21 लोकसभा सीटों पर भाजपा आगे रहेगी जबकि विधानसभा चुनाव में बीजेडी का प्रदर्शन दमदार रहेगा है. हालांकि एग्जिट पोल्स में इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहले से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है. एग्जिट पोल्स के इतर दोनों ही पार्टियां पूर्ण बहुमत के साथ ओडिशा में सरकार बनाने का दावा कर रही हैं.

ओडिशा में 4 जून को लोकसभा और विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जो हों लेकिन ये परिणाम 5 बेहद अहम फैसले करने जा रहा है...

बीजेडी की संख्या
प्रदेश की सत्ता में बीजेडी और बीजेपी दोनों भले ही एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाते हों लेकिन जब बात केंद्र की सत्ता की आती है तो नवीन पटनायक ने हमेशा बीजेपी को अपना समर्थन दिया है 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 20 सीटें जीती थीं. वहीं 2019 में बीजेडी के राज्य सभा में 9 सांसद थे. अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम आती हैं तो इस बार उसे बीजेडी के समर्थन की जरूरत पड़ेगी, ऐसे में नवीन पटनायक की भूमिका अहम हो जाएगी.

वीके पांडियन की तकदीर
तमिलनाडु में जन्में इस पूर्व आईएएस अधिकारी को नवीन पटनायक के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है. पूरे लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भाजपा ने वीके पांडियन पर यह कहते हुए हमला बोला कि उन्होंने नवीन पटनायक को कैप्चर कर लिया है. नवीन पटनायक के अस्वस्थ रहने के चलते पांडियन ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने राज्य की सभी 147 विधानसभा सीटो पर प्रचार किया. इस बार का ओडिशा का विधानसभा चुनाव वीके पांडियन के भविष्य का फैसला करने के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण होने वाले हैं. अगर भाजपा को विधानसभा चुनावों में बड़ी बढ़त मिली है तो पांडियन की कुर्सी खतरे में आ सकती है.

कांग्रेस का भविष्य
ओडिशा का चुनाव राज्य में कांग्रेस का भविष्य भी तय करेगा. राज्य की सत्ता पर 40 साल से ज्यादा समय तक राज करने वाली यह पार्टी आज राज्य में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 16.3% वोट शेयर के साथ तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई थी. राज्य में उसके विधायकों की संख्या घटकर 9 रह गई थी. अगर इस बार कांग्रेस का प्रदर्शन और खराब रहता है तो कांग्रेस राज्य में केवल साइनबोर्ड पार्टी बनकर रह जाएगी.

संबलपुर सीट पर घमासान
ओडिशा के लोकसभा चुनाव में इस बार सबकी नजरें संबलपुर सीट पर भी जमीं हुई हैं. इस सीट पर ओडिशा में बीजेपी के सबसे प्रमुख चेहरे धर्मेंद्र प्रधान की साख दांव पर है. उनका मुकाबला बीजेजी के संगठनात्मक सचिव और पार्टी में नंबर तीन की हैसियत रखने वाले प्रणव प्रकाश दास से है.

धर्मेंद्र प्रधान ने 15  साल के लंबे अंतराल के बाद ओडिशा विधानसभा चुनाव में वापसी की है. ऐसे में प्रधान की हार जीत मुख्य रूप से संबलपुर में पीएम मोदी की प्रसिद्धी पर निर्भर करेगी.

अपराजिता सारंगी 
पूर्व आईएएस अधिकारी अपराजिता सारंगी ने नवंबर 2018 में बीजेपी ज्वॉइन की थी. उन्हें 2019 के चुनाव में भुवनेश्वर से उम्मीदवार बनाया गया. क्षेत्र में कोई संगठनात्मक उपस्थिति न होने के बावजूद उन्होंने बीजेडी के उम्मीदवार और पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर अरूप पटनायक को जबरदस्त पटखनी दी थी. इस बार बीजेडी ने सारंगी को पटखनी देने के लिए 6 बार के कांग्रेस विधायक सुरेश कुमार राउतराय के बेटे मनमथ राउतराय को मैदान में उतारा है.