नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने मातृत्व अवकाश को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को नई पहचान देता है. अदालत ने साफ किया कि बच्चे की उम्र चाहे कुछ भी हो, दत्तक मां को भी वही सम्मान और सुविधाएं मिलनी चाहिए जो बायोलॉजिकल मां को मिलती हैं.
अदालत ने कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मैटरनिटी लीव से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. यह फैसला दो जजों की बेंच जस्टिस जेबी पार्दीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने सुनाया है. कोर्ट ने माना कि ऐसी पाबंदियां महिलाओं के साथ भेदभाव करती हैं.
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व की सुरक्षा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि बच्चा कैसे मां के जीवन में आया. चाहे जन्म से हो या गोद लेकर दोनों ही स्थितियों में मां को समान भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारियां निभानी होती हैं. अदालत ने इस सोच को बदलने की जरूरत पर जोर दिया.
कोर्ट ने Social Security Code 2020 की धारा 60(4) में मौजूद उम्र सीमा को असंवैधानिक करार दिया. अदालत ने कहा कि यह प्रावधान वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करता है, जहां बड़े बच्चे को गोद लेने पर भी उतना ही समायोजन और देखभाल की जरूरत होती है.
फैसले में यह भी कहा गया कि बायोलॉलिकल और गोद लेने वाली माताओं में फर्क करना सामाजिक सुरक्षा के अधिकारों को सीमित करता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि गोद लेना भी प्रजनन के अधिकार का ही एक रूप है. यह निर्णय समाज में समानता और संवेदनशीलता को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.