नई दिल्ली: भारत अपनी रसोई गैस की जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आयात करता है. हाल ही में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के कारण यह व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गया है, जिससे देश के सामने ईंधन का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. इस चुनौतीपूर्ण समय में दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना भारत के एक अप्रत्याशित लेकिन विश्वसनीय साथी के रूप में सामने आया है. यह साझेदारी भारत की रणनीतिक ऊर्जा विविधीकरण नीति की सफलता को दर्शाती है.
अर्जेंटीना ने संकट के समय भारत की तत्काल मदद के लिए हाथ बढ़ाया है. होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से जो आपूर्ति बाधित हुई थी, उसे अर्जेंटीना से आने वाली गैस ने संतुलित किया है. यह देश अब भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा भागीदार के रूप में उभरा है. भारत सरकार को मजबूरन अपने ऊर्जा स्रोतों में बदलाव करना पड़ा है, जिसमें अर्जेंटीना का सहयोग एक बड़ी सफलता साबित हो रहा है. यह वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती साख का भी प्रतीक है.
साल 2026 की पहली तिमाही में अर्जेंटीना ने भारत को 50,000 टन एलपीजी का निर्यात किया है. यह आंकड़ा पिछले पूरे वर्ष के 22,000 टन के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है. संघर्ष की स्थिति गंभीर होने से पहले ही बाहिया ब्लैंका बंदरगाह से 39,000 टन माल रवाना हो चुका था. इसके बाद 5 मार्च को 11,000 टन की एक और अतिरिक्त खेप भेजी गई. यह आंकड़े संकट के समय भारत को समर्थन देने के लिए अर्जेंटीना की प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं.
भारत में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो अगस्टिन कौसिनो ने इस सहयोग को अभी सिर्फ शुरुआत बताया है. उनके अनुसार अर्जेंटीना के पास गैस के विशाल भंडार हैं जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. अर्जेंटीना की राष्ट्रीय गैस कंपनी के अध्यक्ष ने भारतीय कंपनियों और ऊर्जा मंत्री हरदीप पुरी से कई बार मुलाकात की है. यह कूटनीतिक सक्रियता दर्शाती है कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच ऊर्जा संबंधों का दायरा और अधिक विस्तारित होगा, जिससे भारत की स्थिरता बढ़ेगी.
हालांकि इस साझेदारी की राह में भौगोलिक दूरियां एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अर्जेंटीना के बाहिया ब्लैंका बंदरगाह और गुजरात के दहेज के बीच की दूरी लगभग 20,000 किलोमीटर है. यह दुनिया के सबसे लंबे ऊर्जा शिपमेंट मार्गों में से एक माना जाता है. लंबी दूरी के कारण न केवल परिवहन की लागत बढ़ जाती है, बल्कि डिलीवरी में भी काफी समय लगता है. इसके अलावा समुद्री रास्ते में मौसम संबंधी जोखिमों और लॉजिस्टिक जटिलताओं का सामना भी करना पड़ता है.