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वह गांव जिसे अंग्रेजों ने नक्शे से मिटाने की कोशिश की, जब सातारा में बनी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाली समानांतर सरकार

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद महाराष्ट्र के सातारा में बनी 'प्रति सरकार' ने अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी. गांवों ने वैकल्पिक प्रशासन चलाया और ब्रिटिश दमन के बावजूद लंबे समय तक स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी.

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वह गांव जिसे अंग्रेजों ने नक्शे से मिटाने की कोशिश की, जब सातारा में बनी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाली समानांतर सरकार
Courtesy: AI Generated

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनके बारे में आज भी बहुत कम चर्चा होती है. ऐसी ही एक कहानी महाराष्ट्र के सातारा जिले की है, जहां 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लोगों ने अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दे दी. कई गांवों ने ब्रिटिश प्रशासन के आदेश मानने से इनकार कर दिया और यहां एक समानांतर व्यवस्था बनाई गई, जिसे 'प्रति सरकार' (Parallel Government) के नाम से जाना गया. यह आंदोलन केवल विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों ने अपने स्तर पर प्रशासन चलाने की भी कोशिश की.

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का आह्वान किया. इसके तुरंत बाद देशभर में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू हो गईं. कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेता जेल भेज दिए गए. अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व के बिना आंदोलन शांत हो जाएगा, लेकिन कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने खुद नेतृत्व संभाल लिया. महाराष्ट्र का सातारा जिला भी ऐसा ही एक क्षेत्र था.

कैसे बनी 'प्रति सरकार'?

सातारा में स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिसिंह नाना पाटिल के नेतृत्व में 1943 में 'प्रति सरकार' का गठन हुआ. इसका उद्देश्य अंग्रेजी प्रशासन का बहिष्कार करना और जनता के सहयोग से वैकल्पिक प्रशासन चलाना था. इस समानांतर सरकार का प्रभाव सातारा और आसपास के सैकड़ों गांवों तक पहुंच गया. कई स्थानों पर लोगों ने सरकारी अधिकारियों से सहयोग करना बंद कर दिया और अपने फैसले स्वयं लेने लगे.

गांवों ने अंग्रेजी शासन को मानने से किया इनकार

प्रति सरकार के प्रभाव वाले कई गांवों में ब्रिटिश प्रशासन की पकड़ लगभग खत्म हो गई थी. लोग सरकारी आदेशों की जगह स्थानीय समितियों के निर्णय मानते थे. छोटे-मोटे विवाद गांव स्तर पर ही सुलझाए जाते थे. जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाती थी और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया जाता था. इससे लोगों में आत्मविश्वास बढ़ा और स्वतंत्र शासन की भावना मजबूत हुई.

अंग्रेजों ने शुरू किया कड़ा दमन

जब ब्रिटिश सरकार को इस समानांतर व्यवस्था की जानकारी मिली तो उसने इसे कुचलने के लिए सख्त कार्रवाई शुरू कर दी. कई गांवों में पुलिस और सेना भेजी गई. बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया, घरों की तलाशी ली गई और स्वतंत्रता सेनानियों की संपत्ति जब्त की गई. कई स्थानों पर लोगों को डराने के लिए कठोर दमन किया गया. हालांकि, इन कार्रवाइयों के बावजूद आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. लोककथाओं और कुछ स्थानीय विवरणों में यह दावा मिलता है कि अंग्रेजों ने विद्रोही गांवों को पूरी तरह खत्म करने और उनके अस्तित्व को मिटाने जैसी कठोर योजनाएं बनाईं.

लगभग तीन साल तक चलता रहा संघर्ष

प्रति सरकार का प्रभाव 1943 से 1946 तक विभिन्न क्षेत्रों में बना रहा. यह उस दौर की सबसे प्रभावशाली समानांतर सरकारों में गिनी जाती है. इसने साबित किया कि स्थानीय स्तर पर संगठित जनता अंग्रेजी शासन को चुनौती देने की क्षमता रखती थी. बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के तेज होने और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ इसका प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो गया.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्यों है इसका महत्व?

सातारा की प्रति सरकार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक अनोखा उदाहरण है. इसने दिखाया कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े नेताओं या बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि गांवों के साधारण लोगों ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष किया. यह आंदोलन लोकतांत्रिक भागीदारी, जनसंगठन और आत्मनिर्भर प्रशासन की भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है.

सातारा की प्रति सरकार आजादी के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जो बताता है कि स्वतंत्रता केवल आंदोलनों और भाषणों से नहीं, बल्कि आम लोगों के साहस, संगठन और त्याग से भी हासिल हुई. यह कहानी याद दिलाती है कि भारत के अनेक गांवों ने अंग्रेजी शासन के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया.