दिल्ली हाई कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सरकारी सफदरजंग अस्पताल से निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की मांग पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वांगचुक की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ है. अदालत ने माना कि उनकी बिगड़ती सेहत को देखते हुए प्रशासन द्वारा अस्पताल में भर्ती कराना मनमाना कदम नहीं था.
सोनम वांगचुक कथित नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर पिछले तीन सप्ताह से भूख हड़ताल पर थे. दिल्ली की उमस भरी गर्मी के बीच उनकी तबीयत लगातार खराब होने पर पुलिस ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया. सरकार ने अदालत को बताया कि लंबे समय तक उपवास के कारण शरीर में पानी की कमी, कीटोसिस और पोटैशियम स्तर में गिरावट जैसी गंभीर चिकित्सीय समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे किडनी सहित अन्य अंग प्रभावित होने का खतरा रहता है.
सुनवाई के दौरान डॉक्टरों ने अदालत को बताया कि वांगचुक की सहमति से उन्हें बिना चीनी वाला ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) और आवश्यक मौखिक दवाएं दी जा रही हैं. चूंकि उन्होंने नस के जरिए दवा या शुगर एवं विटामिन युक्त सप्लीमेंट लेने से इनकार किया है, इसलिए चिकित्सक उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं. अदालत ने कहा कि सहमति से उपचार दिए जाने के कारण इसे बलपूर्वक इलाज या स्वायत्तता के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता.
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सफदरजंग अस्पताल पर भरोसा न होने की बात कहते हुए उन्हें निजी अस्पताल मेडांटा ले जाने की अनुमति मांगी. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि व्यक्ति को अपने शरीर और उपचार से जुड़े फैसले स्वयं लेने का अधिकार है. उन्होंने अदालत से कहा कि वांगचुक अपनी पसंद के डॉक्टरों से इलाज कराना चाहते हैं.
केंद्र सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि वांगचुक का जीवन बचाने के लिए डॉक्टरों को आवश्यक चिकित्सीय कदम उठाने की अनुमति दी जाए. इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज की चिकित्सा संबंधी जरूरतों का अंतिम निर्णय उपचार कर रही मेडिकल टीम ही करेगी. फिलहाल वांगचुक सफदरजंग अस्पताल में चिकित्सकीय निगरानी में रहेंगे और मामले की अगली सुनवाई में अदालत आगे की स्थिति पर विचार करेगी.