पश्चिम बंगाल की राजनीति में रेजिनगर उपचुनाव को लेकर अचानक स्थिति बदल गई है. ममता बनर्जी के बेहद वफादार और अनुभवी नेता रबीउल आलम चौधरी ने अपना पर्चा वापस लेने के कुछ ही घंटों बाद दोबारा चुनावी समर में उतरने का साहसिक फैसला लिया है. उनके इस फैसले से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है.
दरअसल, रबीउल आलम ने पहले चुनाव आयोग द्वारा मिले नए चुनाव चिन्ह से जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतों और जमीनी स्तर पर वफादार कार्यकर्ताओं को मिल रही धमकियों का हवाला देकर कदम पीछे खींच लिए थे. हालांकि, पार्टी की शीर्ष कमान से संदेश मिलते ही उन्होंने फिर पूरी ताकत के साथ प्रचार में उतरने की घोषणा कर दी.
चुनाव आयोग के एक अंतरिम आदेश के बाद तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक प्रतीक चिन्ह का उपयोग रोक दिया गया है. ऐसे में उम्मीदवारों को नए चिन्ह पर वोट मांगना एक बेहद कठिन चुनौती लग रहा था. रबीउल चौधरी ने भी खुलकर माना कि सीमित समय में मतदाताओं के बीच नए प्रतीक को पहुंचाना काफी मुश्किल काम है.
नामांकन वापस लेने के तुरंत बाद रबीउल की सीधी बातचीत ममता बनर्जी से हुई. बातचीत के दौरान उन्हें परिस्थिति के अनुसार सही कदम उठाने की सलाह दी गई. इस अहम संवाद के ठीक बाद उन्होंने अपना रुख बदला और शनिवार से पूरे निर्वाचन क्षेत्र में बड़े स्तर पर जनसंपर्क और चुनावी प्रचार शुरू करने का ठोस फैसला लिया.
बंगाल के इस उपचुनाव में राजनीतिक नाटकीयता केवल एक सीट तक सीमित नहीं है. नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने भी बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अपना नाम वापस ले लिया. इस लगातार बदलती स्थिति से राज्य की राजनीति में नया मोड़ आ गया है.
पार्टी के नाम और प्रतीक चिन्ह को लेकर जारी इस खींचतान के बीच ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है. आयोग का यह फैसला एक अंतरिम व्यवस्था है, लेकिन इससे तृणमूल कांग्रेस के सामने एक बड़ी रणनीतिक और कानूनी परीक्षा खड़ी हो गई है.