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PM मोदी के सामने चुनौतियों की पूरी लिस्ट, क्या अपनाएंगे अटल वाजपेयी वाली 1998 की रणनीति

PM Modi Challenges: नरेंद्र मोदी ने रविवार को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. ऐसा करने वाले नेहरू के बाद पीएम मोदी दूसरे नेता हैं. कहा जा रहा है कि गठबंधन वाली सरकार चलाने के लिए पीएम मोदी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

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Courtesy: BJP Twitter Handle

PM Modi Challenges: पहली बार गठबंधन सरकार चलाने वाले पीएम मोदी को कई चुनौतियों को सामना करना पड़ सकता है. मोटे तौर पर इसे समझा जाए तो चुनौतियों में एनडीए में शामिल सहयोगियों के साथ 5 साल तक तालमेल बनाना, मजबूत विपक्ष के सदन में सामना करना और भाजपा-आरएसएस संबंधों को लेकर तालमेल बिठाना हो सकता है. 

नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं, इस बार वे गठबंधन सरकार के मुखिया हैं. रविवार को जब उन्होंने राष्ट्रपति भवन में पद और गोपनीयता की शपथ ली तो लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या मोदी गठबंधन सरकार चलाने में सक्षम हो सकते हैं?

द इंडियन एक्सप्रेस में नीरजा चौधरी के कॉलम में छपी खबर के मुताबिक, भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी ने 1996, 1998 और 1999 में अपने प्रधानमंत्रित्व काल में गठबंधन सरकारें चलाईं. इसके ठीक उलट, नरेंद्र मोदी ने हमेशा गुजरात (2001 से 2014) और पिछले 10 वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत वाली सरकारें चलाई हैं. 4 जून को नतीजे बिल्कुल प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे, लेकिन अगली शाम उन्होंने अपने कैबिनेट सहयोगियों को संबोधित किया. माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें बताया कि वे  गठबंधन सरकार को सफलतापूर्वक चलाएंगे और गठबंधन धर्म को पूरा करेंगे. 

मोदी का नया मंत्रिमंडल उनकी पहली सफलता का संदेश?

मोदी का नया मंत्रिमंडल उनकी पहली सफलता का संकेत देता है. उन्होंने अपने कई पुराने और अनुभवी सहयोगियों को तो मंत्रिमंडल में बनाए ही रखा है, साथ ही सहयोगी दलों को भी इसमें शामिल किया है. सहयोगियों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में टीडीपी (16 सांसद) और जनता दल- यूनाइटेड (12) शामिल है. दोनों ही पार्टियों के पास वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शासन करने का लंबा अनुभव है.

पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री ने अपना रुख बदला है और सुलह-समझौते के सुर दिखाए हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि सरकार मोदी या भाजपा की नहीं बल्कि एनडीए की सरकार है. शुरुआत से ही भाजपा के विपरीत, एनडीए को प्राथमिकता दी गई है. मोदी ने अपने मंत्रियों को चुनने का प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार भी छोड़ दिया था. गठबंधन सहयोगियों के नेताओं ने अपने दलों से उन लोगों के नाम भेजे थे, जिन्हें मंत्री पद की शपथ लेनी थी. 

आखिर मोदी के सामने अब क्या होंगी चुनौतियां?

राजनीति के जानकारों की माने तो नरेंद्र मोदी को तीन मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. उन्हें सहयोगियों को साथ लेकर चलना होगा. मंत्रिमंडल में सहयोगियों को जगह देना कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा है. अगली कहानी तो पहले से चल रही कुछ योजनाओं पर सहयोगी दलों की आपत्ति और उनकी समीक्षा है. सहयोगी दलों ने पहले से चल रही अग्निपथ योजना की समीक्षा की मांग की है. इसके अलावा, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे पर भी मोदी को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इसके बाद उनके लिए 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' नीति को लागू करना मुश्किल हो सकता है. मोदी, राष्ट्रीय जाति जनगणना की नीतीश कुमार की मांग से कैसे निपटेंगे, ये देखना अभी बाकी है.

मोदी के लिए दूसरी चुनौती लोकसभा में मजबूत विपक्ष से आएगी. सदन में 232 सदस्यों के साथ विपक्ष ने जोरदार वापसी की है. संसद के दोनों सदनों में बिना चर्चा के विधेयक पारित करना या सदस्यों को अयोग्य ठहराना और निलंबित करना अधिक कठिन होगा. 

मोदी के सामने तीसरी और सबसे कठिन चुनौती पार्टी और आरएसएस के बीच तालमेल बिठाना होगा. पिछले कुछ दिनों में भाजपा के सीनियर नेताओं और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच बैठकें हुई हैं. इसके अलावा, आरएसएस नेतृत्व की आंतरिक बैठकें भी हुई हैं, जिसमें भाजपा की 60 से अधिक सीटों की गिरावट के कारणों पर चर्चा की गई है. लेकिन भाजपा और आरएसएस के सीनियर नेता फिलहाल चुप हैं. कहा जा रहा है कि इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद ही वे कुछ निर्णय लेंगे. महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और शायद अगले साल दिल्ली और बिहार में भी चुनाव होने हैं. इन सभी राज्यों में, INDIA गठबंधन, NDA को तगड़ी चुनौती दे सकता है. 

क्या अटल बिहारी वाजपेयी के रास्ते पर चलेंगे पीएम मोदी?

देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी सहयोगियों के साथ गठबंधन वाली सरकारें चलाई थीं. हालांकि, उनके सामने जो चुनौतियां थीं, फिलहाल नरेंद्र मोदी के पास वैसी चुनौतियां नहीं हैं. राजनीति के जानकारों की मानें तो सहयोगियों की वजह से परेशान होकर, नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किया और अपने अलग-थलग सहयोगियों की आवाज़ को दबा दिया था. उन्होंने 1996 में इसकी पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन उन्होंने सहयोगियों को मात देने के लिए सही वक्त का इंतजार किया. अब सवाल यह उठता है कि अगर मोदी अगले कुछ महीनों या सालों में मुश्किल में पड़ गए तो वे क्या कदम उठाएंगे?