सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है, जिसमें कहा गया था कि महिला की सलवार उतारना और सीने को दबाना दुष्कर्म (रेप) का प्रयास नहीं माना जा सकता. मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि हाईकोर्ट के ये कमेंट्स बेहद आपत्तिजनक हैं और आरोपी का पक्ष सुनने के बाद इस फैसले को खारिज किया जा सकता है.
इससे पहले जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे ही एक विवादित फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें नाबालिग की छाती दबाने या नाड़ा तोड़ने को रेप की कोशिश नहीं माना गया था. वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता द्वारा पटना हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी दिए जाने के बाद शीर्ष अदालत ने देश की सभी अदालतों को यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया था.
यह मामला वर्ष 2008 में बिहार के बांका जिले में दर्ज हुआ था. पीड़िता का आरोप था कि जब वह एक फोटो स्टूडियो गई, तो उसके मालिक हिमांशु ने दरवाजा बंद कर जबरदस्ती की और उसकी सलवार उतारने का प्रयास किया. 2013 में बांका की निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 3 साल की सजा सुनाई थी. हालांकि, 13 साल बाद पटना हाईकोर्ट ने सबूतों और मेडिकल रिपोर्ट की कमी का हवाला देते हुए आरोपी को बरी कर दिया.
हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपने फैसले में कहा था कि हालांकि यह घटना महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, लेकिन जब तक यौन संबंध बनाने का कोई स्पष्ट शारीरिक प्रयास या पेनिट्रेशन साबित नहीं होता, इसे 'रेप की कोशिश' नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने जांच अधिकारियों व डॉक्टरों की गवाही न होने और बयानों में विरोधाभास को बरी करने का मुख्य आधार बनाया.
भारतीय कानून के तहत अपराध की योजना बनाना या साधन जुटाना 'तैयारी' कहलाता है. वहीं जब तैयारी खत्म होकर अपराध को अंजाम देने की दिशा में सीधा कदम बढ़ाया जाता है, तो उसे 'प्रयास' (Attempt) माना जाता है. भले ही अपराध पूरा न हो पाए, लेकिन गलत इरादे और नैतिक अपराध के कारण 'प्रयास' के लिए सख्त सजा का प्रावधान है.
इस विवादित फैसले पर सामाजिक और कानूनी विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रिया आई है. जानकारों का कहना है कि जहां कानूनी दृष्टिकोण से कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला देता है, वहीं मनोविज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे फैसलों से महिलाओं में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास बढ़ता है. इससे पीड़िताएं शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाएंगी और अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे.