पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस तेज है. चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि आंकड़ों को देखने पर वोटर डिलीशन और चुनावी नतीजों के बीच सीधा संबंध साबित नहीं होता.
संबित पात्रा ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल की उन 20 विधानसभा सीटों में, जहां मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाए गए, 13 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और छह पर भाजपा ने जीत दर्ज की. उनका तर्क था कि अगर नाम हटाए जाने से भाजपा को चुनावी फायदा मिला होता, तो इन सीटों के नतीजों में यह तस्वीर अलग दिखाई देती. हालांकि, ये आंकड़े भाजपा की ओर से राजनीतिक तर्क के तौर पर पेश किए गए हैं.
पात्रा ने मुर्शिदाबाद की समसेरगंज विधानसभा सीट का भी उदाहरण दिया. उनके अनुसार SIR के बाद यहां 91,712 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जो सीट के कुल मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा था. इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस के मोहम्मद नूर आलम ने 61,918 वोट हासिल कर जीत दर्ज की. भाजपा यहां मुकाबले में प्रमुख स्थिति में नहीं थी.
यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद बढ़ा जिसमें चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया. *द इंडियन एक्सप्रेस* की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कई मौकों पर प्रक्रियाओं को लेकर सवाल दर्ज कराए. रिपोर्ट में मतदाता नाम जोड़ने, हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख है.
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि अलग-अलग विचार और सुझाव किसी भी संस्थान में होने वाली चर्चा का सामान्य हिस्सा हैं. आयोग के सूत्रों ने यह भी कहा कि SIR समेत उसके फैसले सभी तीन चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए. ऐसे में फिलहाल विवाद का केंद्र मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया, आयोग के भीतर हुई चर्चाओं और उनके राजनीतिक असर को लेकर अलग-अलग दावों पर है.