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India Daily

राज्यपालों द्वारा बिलों को मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय नहीं की जा सकती- SC

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपालों द्वारा बिलों को मंज़ूरी देने के लिए समयसीमा तय नहीं की जा सकती.

Shilpa Shrivastava
राज्यपालों द्वारा बिलों को मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय नहीं की जा सकती- SC
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: राज्यों के राज्यपाल के बिल को मंजूरी देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है. कोर्ट ने कहा है कि जब बिल को मंजूरी देने की बात आती है, तो राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपाल को टाइमलाइन से बंधे नहीं हो सकते. यह फैसला पांच जजों की संविधान बेंच ने दिया. इन सभी ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति या राज्यपालों के काम न्यायसंगत नहीं हैं और ज्यूडिशियल रिव्यू तभी किया जा सकता है जब कोई बिल कानून बन जाए.

बता दें कि यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सवालों के जवाब में आया है, जिसमें उन्होंने तमिलनाडु गवर्नर केस में दो जजों की बेंच के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट से सवाल किए थे. इस फैसले में राष्ट्रपति और गवर्नरों के लिए लेजिस्लेचर से पास हुए बिल को पास करने की एक डेडलाइन तय की गई थी.

राष्ट्रपति ने पूछा था सवाल:

संविधान के आर्टिकल 143 के तहत कोर्ट की राय मांगते हुए, राष्ट्रपति ने पूछा था कि क्या गवर्नर, भारत के संविधान के आर्टिकल 200 के तहत उनके सामने कोई बिल पेश होने पर उनके पास मौजूद सभी ऑप्शन का इस्तेमाल करते समय काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की मदद और सलाह मानने के लिए बाध्य हैं?

 उन्होंने संविधान के आर्टिकल 361 का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति या गवर्नर अपने ऑफिस की शक्तियों और ड्यूटी के इस्तेमाल के लिए किसी भी कोर्ट के सामने जवाबदेह नहीं होंगे. भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली बेंच ने आज कहा कि टाइमलाइन लागू करना संविधान के पूरी तरह खिलाफ है. बेंच में दूसरे जज जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर थे.

गवर्नर के पास तीन ऑप्शन हैं- सुप्रीम कोर्ट

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के आर्टिकल 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी. इसका जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि गवर्नर के पास तीन ऑप्शन हैं जिसमें या तो वो मंजूरी दें, या बिल को विचार के लिए दोबारा भेजें या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजें. इसके साथ ही कहा कि भारत जैसे डेमोक्रेटिक देश में, गवर्नर के लिए टाइमलाइन तय करना संविधान में दी गई छूट के खिलाफ है.