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India Daily

Nithari Surendra Koli: एक बंद कोठी, बच्चियों-महिलाओं का शिकार... निठारी कांड के उस 'राक्षस' की कहानी; खाता था इंसानी मांस!

नोएडा का निठारी कांड भारत के सबसे खौफनाक अपराधों में से एक है. सेक्टर 31 की कोठी नंबर D 5 से अचानक गायब हुए मासूम बच्चों और महिलाओं के नरकंकाल जब नाले से निकले, तो पूरा देश सहम उठा था.

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Edited By: Reepu Kumari
Nithari Surendra Koli: एक बंद कोठी, बच्चियों-महिलाओं का शिकार... निठारी कांड के उस 'राक्षस' की कहानी; खाता था इंसानी मांस!
Courtesy: Grok

Nithari Case Surendra Koli: साल 2005 और 2006 के बीच नोएडा के निठारी गांव से अचानक गरीब घरों के मासूम बच्चे और युवतियां गायब होने लगीं. किसी को अंदाजा नहीं था कि पड़ोस की एक आलीशान कोठी के पीछे इंसानियत का सबसे कूर चेहरा छिपा हुआ है. जब 2006 में एक नाबालिग लड़की की तलाश में जांच आगे बढ़ी, तो पुलिस के कदम सेक्टर 31 स्थित D 5 कोठी तक जा पहुंचे. वहां के नाले की खुदाई में जो कंकाल और सड़े गले अवशेष मिले, उसने पूरे देश की रूह को कंपा कर रख दिया.

काले कारनामों का पर्दाफाश

जांच आगे बढ़ी तो कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली का नाम सामने आया. मासूमों को लालच देकर कोठी के अंदर बुलाना और फिर उनके साथ हैवानियत करना इस वारदात का हिस्सा था. दरिंदगी की हदें तब पार हुईं जब हत्या के बाद शवों को ठिकाने लगाने के लिए उनके टुकड़े -टुकड़े कर दिए जाते थे. रिपोर्ट की मानें तो एक बार उसने अदालत में कबूल किया था वह शव के टुकड़ों को पकाकर खाता था. इस दिल दहला देने वाली कहानी ने समाज में डर का एक ऐसा मंजर पैदा किया जिसे भुला पाना नामुमकिन है.

इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकतें 

सुरेंद्र कोली के कबूलनामे ने जांच अधिकारियों तक के होश उड़ा दिए थे. टॉफी, चॉकलेट और पैसों का लालच देकर बच्चों को फुसलाना उसकी पहली चाल होती थी. इसके बाद कोठी की चारदीवारी के भीतर जो कुछ भी हुआ, वह किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है. इस खौफनाक कांड ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कैसे चकाचौंध से भरे शहरों के बीच गरीबों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं समझी जाती.

अदालती कार्यवाही और कानूनी मोड़ 

इस मामले में लंबी कानूनी लड़ाई चली. निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कई फैसले आए. शुरुआती जांच में पंढेर और कोली दोनों को मुख्य आरोपी माना गया था. हालांकि, बाद में सबूतों की कमी और जांच की कमियों के आधार पर मोनिंदर सिंह पंढेर को राहत मिल गई. वहीं, वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सुरेंद्र कोली पर कानूनी शिकंजा लंबे समय तक कसा रहा और अदालत में यह केस चलता रहा.

अंतहीन दर्द और अनसुलझे सवाल 

समय बीतने के बावजूद निठारी गांव के उन पीड़ित परिवारों का दर्द आज भी ताजा है, जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़ों को खो दिया. यह घटना सिर्फ एक कानूनी मामला बनकर नहीं रह गई, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही का जीता जागता सबूत बन गई. सालों बाद भी जब इस कांड का नाम सामने आता है, तो खौफ की वही पुरानी खामोशी हवा में तैरने लगती है, जो आज भी इंसाफ की गुहार लगाती नजर आती है.