महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आज यानी 28 जनवरी को विमान हादसे में निधन हो गया. 66 वर्ष के अजित पवार का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा. हालांकि कहा जाता है कि उनके करियर पर हमेशा चाचा शरद पवार की छाया बनी रही, लेकिन उनके बगावती सुर ने उन्हें उनकी पहचान दिलाई.
अजित पवार ने पृथ्वीराज चौहान और उद्धव ठाकरे से लेकर देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल के दौरान तक उपमुख्यमंत्री पद संभाला. हालांकि इसे हासिल करने के लिए उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ कई बार बगावत किया. 23 साल पहले उन्होंने अपने चाचा के साथ पहली बगावत की थी. आज हम आपको उनके बगावत के पूराने किस्सा बताएंगे.
आठ बार के विधायक रहे अजित पवार का अपने चाचा के साथ 2004 में पहली बार संबंध बिगड़े थे. उस समय उन्हें पहली बार ऐसा लगा था कि उनकी पार्टी और उनके चाचा शरद पवार उन्हें दरकिनार करने की कोशिश कर रहे हैं. उन दोनों के बीच तनाव और भी ज्यादा तब बढ़ा जब शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले राजनीति की दुनिया में कदम रखा.
अजित पवार 2009 में उपमुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन चाचा शरद ने पार्टी के अन्य नेता छगन भुजबल पर भरोसा जताया था. इसी वक्त चाचा-भतीजे के बीच पहली दरार पड़ी. उन्होंने उस समय अजित पवार ने इसपर खुला विरोध जताते हुए डिप्टी सीएम पद ना मिलने पर इस्तीफे की धमकी दी थी. हालांकि बाद में यह मामला शांत हो गया और चाचा-भतीजा एक हो गए. इसके बाद 2023 में एक बार फिर चाचा-भतीजा के बीच बगावत देखने को मिला. जिसकी वजह से एनसीपी पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई.
अजित पवार के बगावती सुर शरद पवार के लिए काफी महंगा पड़ा. चाचा-भतीजा दोनों का अलग-अलग एनसीपी पार्टी बन गया. हालांकि चुनाव आयोग की ओर से अजित पवार की एनसीपी को असली पार्टी का दर्जा मिला और उनके पास ही घड़ी चुनाव चिन्ह रहा. वहीं चाचा शरद पवार ने तुर्हा को चुनाव चिन्ह के रूप में चुना. इस चुनाव में अजित पवार को 40 सीटों पर जीत मिली थी. जिसके बाद एक बार फिर से उन्हें महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री बनाया गया. हालांकि हाल में हुए महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव के बाद चाचा-भतीजा के रिश्ते में एक बार फिर शांति नजर आने लगी थी. कहा जा रहा था कि हो सकता है कि दोनों एक बार फिर से एक हो जाएं क्योंकि चुनाव चिन्ह अलग होने के कारण पार्टी के वोट कट रहे हैं. लेकिन कुछ भी होता उससे पहले अजित पवार का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.