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सादगी से प्रधानमंत्री बनने तक, जानें ‘जय जवान जय किसान’ वाले शास्त्री जी की कहानी

2 अक्टूबर को देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाता है. 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण की मिसाल माना जाता है

Shilpa Shrivastava
सादगी से प्रधानमंत्री बनने तक, जानें ‘जय जवान जय किसान’ वाले शास्त्री जी की कहानी
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: 2 अक्टूबर को देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाता है. 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण की मिसाल माना जाता है. साल 2026 में उनकी 122वीं जयंती मनाई जा रही है.

शास्त्री जी ने आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने से लेकर देश के दूसरे प्रधानमंत्री बनने तक का सफर बेहद संघर्षों के बीच तय किया. प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और खाद्य संकट के दौर में उनके फैसलों ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बनाया.

गरीबी में बीता बचपन:

इनका जन्म मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 को हुआ था. उनके पिता शारदा प्रसाद एक स्कूल शिक्षक थे. जब शास्त्री जी करीब डेढ़ साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद उनकी मां रामदुलारी देवी ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद शास्त्री जी ने पढ़ाई जारी रखी.  उनका बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता. पढ़ाई के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाना पड़ता था. संसाधनों की कमी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकी.

16 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई से जुड़े:

लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थे. महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने महज 16 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया. बाद में वे काशी विद्यापीठ से जुड़े, जहां उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली. यही उपाधि आगे चलकर उनके नाम का हिस्सा बन गई. आजादी की लड़ाई के दौरान वे कई बार जेल गए और कुल मिलाकर करीब सात साल ब्रिटिश जेलों में रहे. इस दौरान उन्होंने पढ़ाई और अध्ययन भी जारी रखा.

रेल दुर्घटना के बाद दिया इस्तीफा:

आजादी के बाद शास्त्री जी ने उत्तर प्रदेश सरकार में काम किया और बाद में केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं. वे रेल मंत्री समेत कई मंत्रालयों के मंत्री रहे. रेल मंत्री रहते हुए एक बड़ी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया. प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, उस समय जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके इस्तीफे को संवैधानिक जिम्मेदारी और उदाहरण के रूप में देखा था. 

देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने:

जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बने. उनका प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल करीब 19 महीने का रहा. इस दौरान देश को खाद्य संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. खाद्य संकट के समय उन्होंने लोगों से भोजन बचाने और सप्ताह में एक दिन भोजन छोड़ने की अपील की. बताया जाता है कि उन्होंने पहले अपने परिवार में इसका पालन शुरू कराया, फिर देशवासियों से ऐसा करने को कहा.

‘जय जवान, जय किसान’ बना राष्ट्रीय नारा:

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान शास्त्री जी ने देश का नेतृत्व किया. इसी दौर में उनका प्रसिद्ध नारा ‘जय जवान, जय किसान’ सामने आया, जिसने सैनिकों और किसानों के महत्व को एक साथ रेखांकित किया.  कृषि और खाद्य उत्पादन बढ़ाने पर भी उनके कार्यकाल में विशेष जोर दिया गया. 1964 में आनंद की यात्रा के बाद राष्ट्रीय स्तर पर डेयरी सहकारिता मॉडल को बढ़ाने की पहल हुई और 1965 में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) की स्थापना हुई. आगे चलकर इसी व्यवस्था ने भारत की श्वेत क्रांति की नींव मजबूत करने में भूमिका निभाई. 

ताशकंद में हुआ निधन:

भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शांति समझौते के लिए शास्त्री जी ताशकंद गए. 10 जनवरी 1966 को ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए. इसके अगले दिन, 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन हो गया. उनकी मृत्यु का आधिकारिक कारण हृदयाघात बताया गया, जबकि उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर समय-समय पर सवाल और चर्चाएं उठती रही हैं. 

आज भी लाल बहादुर शास्त्री को उनकी सादगी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और देशसेवा के लिए याद किया जाता है. उनकी 122वीं जयंती पर उनका जीवन यह याद दिलाता है कि बड़े पद से ज्यादा महत्वपूर्ण सार्वजनिक जीवन में सिद्धांत और जिम्मेदारी हो सकते हैं.