कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके के नाम पाकिस्तान के लाहौर से लिखे गए एक खुले पत्र ने सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है. खुद को लाहौर का एक युवा कार्यकर्ता बताने वाले एहतेशाम हसन ने पत्र में भारत और पाकिस्तान के युवाओं की समान समस्याओं का उल्लेख करते हुए दिपके के आंदोलन की सराहना की है. पत्र में कहा गया है कि दोनों देशों के युवा बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों और भविष्य को लेकर एक जैसी चिंताओं का सामना कर रहे हैं.
पत्र में एहतेशाम ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर युवाओं के संदर्भ में "कॉकरोच" शब्द इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई. लेखक का दावा है कि अभिजीत दिपके ने इसी शब्द को अपने राजनीतिक आंदोलन की पहचान बनाकर विरोध का प्रतीक तैयार किया. पत्र में कहा गया कि दक्षिण एशिया के कई देशों में बेरोजगार और संघर्ष कर रहे युवाओं के प्रति सत्ता का रवैया लगभग एक जैसा दिखाई देता है.
पत्र में पाकिस्तान के मेडिकल और डेंटल कॉलेज प्रवेश परीक्षा विवाद का जिक्र करते हुए इसकी तुलना भारत में हुई परीक्षा संबंधी अनियमितताओं से की गई है. लेखक ने कहा कि दोनों देशों में युवाओं को रोजगार, महंगी कोचिंग, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और बेहतर जीवन स्तर जैसी समान चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. साथ ही यह भी लिखा गया कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी दोनों देशों के करोड़ों युवाओं को बुनियादी सुविधाओं और अवसरों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
पत्र में दक्षिण एशिया के युवाओं से शिक्षा, जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी के माध्यम से बदलाव लाने की अपील की गई है. लेखक का कहना है कि नई पीढ़ी को सीमाओं से ऊपर उठकर साझा समस्याओं पर विचार करना चाहिए. पत्र में भारत में सक्रिय नागरिक समाज और डिजिटल माध्यमों पर युवाओं की भागीदारी का भी उल्लेख करते हुए इसे प्रेरणादायक बताया गया है. हालांकि, इसमें व्यक्त सभी विचार लेखक के निजी हैं और किसी सरकार या संस्था का आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं माने जाते.
यह खुला पत्र सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी व्यापक चर्चा हो रही है. कई लोग इसे दक्षिण एशिया के युवाओं की साझा आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति बता रहे हैं, जबकि अन्य इसे एक व्यक्तिगत राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं. फिलहाल अभिजीत दिपके की ओर से इस पत्र पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. हालांकि, इस पत्र ने भारत-पाकिस्तान के युवाओं की चुनौतियों और लोकतांत्रिक संवाद को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है.