नई दिल्ली: दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है. 2016 के चर्चित विवाद के करीब दस साल बाद, कैंपस में कथित नारेबाजी को लेकर नया टकराव सामने आया है. इस बार मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न दिए जाने के फैसले के विरोध से जुड़ा है. छात्रों के प्रदर्शन, वीडियो क्लिप और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने जेएनयू को फिर राष्ट्रीय बहस में ला खड़ा किया है.
5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों की साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया. इसके विरोध में जेएनयू में एक सभा हुई, जो 2020 में कैंपस में हुई हिंसा की बरसी से भी जुड़ी थी. इस दौरान लगाए गए कथित नारों के वीडियो सामने आए. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इन्हें आचार संहिता के खिलाफ बताते हुए FIR की मांग की.
जेएनयू प्रशासन का कहना है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ कथित नारे आपत्तिजनक और भड़काऊ थे. सुरक्षा प्रमुख ने इन्हें लोकतांत्रिक विरोध की सीमाओं से बाहर बताया. वहीं, जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा कि नारे वैचारिक थे और किसी व्यक्ति पर निजी हमला नहीं थे. छात्रों का तर्क है कि अदालत के फैसलों से असहमति जताना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है.
2016 की तरह इस बार भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तीखी रहीं. बीजेपी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी और शहरी नक्सल जैसे शब्दों से घेरा. गिरिराज सिंह ने टुकड़े-टुकड़े गैंग का जिक्र किया. दूसरी ओर कांग्रेस और आरजेडी नेताओं ने कहा कि विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन भाषा मर्यादित होनी चाहिए. मनोज झा ने दोहरे मापदंडों की बात कही.
नया विवाद 2016 की घटनाओं की याद दिलाता है, जब अफजल गुरु से जुड़े कार्यक्रम के बाद कथित राष्ट्र-विरोधी नारों पर देशव्यापी हंगामा हुआ था. तब भी वीडियो क्लिप निर्णायक बने थे. बाद में फोरेंसिक जांच में कुछ वीडियो से छेड़छाड़ की बात सामने आई थी. दोनों ही मामलों में पुलिस हस्तक्षेप और आंतरिक जांच की मांग की गई.
2016 के कई प्रमुख चेहरे आज अलग भूमिकाओं में हैं. उमर खालिद 2026 तक पांच साल से अधिक जेल में रह चुके हैं और उन्होंने जमानत खारिज होने के बाद कहा कि यही उनकी जिंदगी है. कन्हैया कुमार कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. शेहला राशिद ने राजनीति में रुख बदला है. जेएनयू का विवाद भले पुराना हो, लेकिन इसके असर और सवाल आज भी उतने ही जीवंत हैं.