भारत की आजादी की कहानी केवल आंदोलनों, जुलूसों और जेल जाने वाले नेताओं की कहानी नहीं है. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई अखबारों के जरिए भी लड़ी गई थी. उस दौर में भारतीय अखबार लोगों तक अंग्रेजी शासन की नीतियों, किसानों की परेशानियों, आर्थिक शोषण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी खबरें पहुंचाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन गए थे.
यही वजह थी कि अंग्रेजी सरकार भारतीय अखबारों पर लगातार नजर रखती थी. कई समाचार पत्रों से जमानत राशि मांगी गई, कुछ के छापेखाने जब्त किए गए, कई प्रकाशनों को बंद कराया गया और संपादकों के खिलाफ मुकदमे चलाए गए.
इतिहास में ऐसे कई अखबार मिलते हैं जो ब्रिटिश शासन की नजर में खटकते थे. अमृत बाजार पत्रिका, केसरी, हिंदी प्रदीप, अल्मोड़ा अखबार, बंदे मातरम्, द कॉमरेड और बिहारी जैसे प्रकाशनों ने अलग-अलग समय पर अंग्रेजी शासन की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई.
भारतीय पत्रकारिता पर ब्रिटिश सरकार का दबाव नया नहीं था, लेकिन 1878 में इसे एक नया और कठोर रूप मिला. लॉर्ड लिटन के शासनकाल में देशी भाषा समाचार पत्र कानून लागू किया गया. इसका निशाना मुख्य रूप से भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र थे.
इस कानून के तहत सरकार को समाचार पत्रों के प्रकाशकों और मुद्रकों से बंधपत्र और जमानत राशि लेने का अधिकार मिला. यदि किसी अखबार में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करने वाली सामग्री प्रकाशित होने का आरोप लगता, तो उसकी जमानत जब्त की जा सकती थी और छापेखाने की मशीनरी तक जब्त की जा सकती थी.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस कानून का असर भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर विशेष रूप से पड़ा. हिंदी, बंगाली, मराठी और दूसरी भारतीय भाषाओं में निकलने वाले अखबार अंग्रेजी सरकार की नीतियों और स्थानीय प्रशासन की मनमानी को आम लोगों तक पहुंचा रहे थे. यही बात शासन को सबसे ज्यादा परेशान करती थी.
इस कानून से बचने की कहानी में अमृत बाजार पत्रिका का नाम सबसे दिलचस्प है. यह समाचार पत्र 1868 में बंगाली भाषा में शुरू हुआ था. इसके संस्थापकों में शिशिर कुमार घोष की महत्वपूर्ण भूमिका थी. पत्रिका ने किसानों के शोषण और नील की खेती से जुड़ी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया.
ब्रिटिश सरकार के दबाव और 1878 के देशी भाषा समाचार पत्र कानून के बाद अमृत बाजार पत्रिका ने अपनी भाषा ही बदल दी. सरकारी अभिलेखों के अनुसार, शिशिर कुमार घोष ने महज सात दिनों के भीतर पत्रिका को अंग्रेजी साप्ताहिक में बदल दिया, ताकि वह उस कानून के दायरे से बाहर निकल सके.
यानी अंग्रेजों ने भारतीय भाषाओं के अखबारों पर शिकंजा कसने के लिए कानून बनाया, लेकिन एक अखबार ने अपनी भाषा बदलकर उस कानून को ही चुनौती दे दी. यह घटना भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में आज भी सबसे रोचक उदाहरणों में गिनी जाती है.
अंग्रेजी शासन की नीतियों पर सवाल उठाने वाले अखबार केवल बंगाल तक सीमित नहीं थे. प्रयागराज से निकलने वाली हिंदी प्रदीप पत्रिका भी राष्ट्रवादी विचारों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी. पंडित बालकृष्ण भट्ट ने 1877 में इसकी शुरुआत की थी. पत्रिका ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों की आलोचना की.
जब 1878 का देशी भाषा समाचार पत्र कानून लागू हुआ तो हिंदी प्रदीप ने भी उसका विरोध किया. पत्रिका में प्रकाशित ‘हम चुप न रहेंगे’ लेख के जरिए इस कानून के खिलाफ आवाज उठाई गई.
इससे साफ होता है कि उस समय पत्रकारिता केवल खबरें प्रकाशित करने तक सीमित नहीं थी. अखबार सामाजिक और राजनीतिक जागरण का माध्यम भी बन चुके थे.
उत्तराखंड के अल्मोड़ा से निकलने वाला अल्मोड़ा अखबार भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी शुरुआत 1871 में हुई थी. शुरुआती दौर में यह स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन बाद में इसने अंग्रेजी प्रशासन की नीतियों के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की.
अखबार ने जबरन कराए जाने वाले कुली बेगार का विरोध किया. इसके अलावा उसने भारतीयों को हथियार रखने से रोकने वाली नीतियों और अंग्रेजी शासन की आर्थिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए.
1913 में बद्री दत्त पांडे इसके संपादक बने और अखबार का राष्ट्रवादी तेवर और मजबूत हुआ. 1918 में जब अखबार ने एक अधिकारी द्वारा कुली पर गोली चलाए जाने की घटना की आलोचना की तो उसे बंद कर दिया गया. यह घटना दिखाती है कि स्थानीय अखबार भी अंग्रेजी प्रशासन के लिए कितने महत्वपूर्ण और असुविधाजनक बन चुके थे.
भारतीय पत्रकारिता और स्वतंत्रता आंदोलन की बात हो और केसरी का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं. बाल गंगाधर तिलक ने मराठी के इस समाचार पत्र के जरिए ब्रिटिश शासन की नीतियों की तीखी आलोचना की.
1897 में केसरी में प्रकाशित ‘शिवाजी के उद्गार’ जैसे लेखों ने अंग्रेजी शासन की नीतियों पर सवाल उठाए. इसके बाद तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें गिरफ्तार किया गया.
लेकिन 1908 का मुकदमा और भी महत्वपूर्ण था. केसरी में प्रकाशित लेखों को आधार बनाकर तिलक पर फिर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया. 23 जुलाई 1908 को बंबई उच्च न्यायालय ने उन्हें छह वर्ष के कारावास की सजा सुनाई. इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेजी सरकार किसी प्रभावशाली संपादकीय लेख को भी राजनीतिक चुनौती मानने लगी थी.
1878 के बाद भी ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर नियंत्रण जारी रखा. 1910 में भारतीय प्रेस कानून लाया गया. इसके तहत सरकार को समाचार पत्रों और छापेखानों पर आर्थिक दबाव डालने के लिए जमानत राशि लेने तथा कुछ परिस्थितियों में उसे जब्त करने जैसी शक्तियां मिलीं. इस कानून का असर अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं दोनों तरह के समाचार पत्रों पर पड़ा.
बिहार में बिहारी नाम का समाचार पत्र सरकार की नजर में विशेष रूप से आया. यह अखबार चंपारण के किसानों और नील की खेती से जुड़े शोषण की समस्याओं को सामने ला रहा था.
सरकारी अधिकारियों ने इसके तेवर को बेहद तीखा माना. 1913 में इसके पुराने संपादक महेश्वरी प्रसाद को पद छोड़ना पड़ा और उसके बाद अखबार पर सरकारी दबाव और स्पष्ट दिखाई देने लगा. बंदे मातरम् ने स्वदेशी आंदोलन की आवाज को मजबूत किया
1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा. इस दौर में बंदे मातरम् जैसे समाचार पत्रों ने आंदोलन को वैचारिक आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सरकारी अभिलेखों के अनुसार, यह पत्र राजनीतिक सभाओं, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल से जुड़े आंदोलनों को प्रमुखता से प्रकाशित करता था.
इसकी खबरों ने राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने और आंदोलन के विचारों को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में भूमिका निभाई. अंग्रेजी सरकार के लिए यह इसलिए चुनौतीपूर्ण था क्योंकि समाचार पत्र स्थानीय घटनाओं को देशव्यापी राजनीतिक सवाल से जोड़ रहे थे.
प्रेस पर सरकारी कार्रवाई केवल भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों तक सीमित नहीं थी. मौलाना मोहम्मद अली जौहर द्वारा प्रकाशित द कॉमरेड भी ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना के लिए जाना जाता था. 1911 से 1914 के बीच प्रकाशित इस समाचार पत्र ने अंग्रेजी शासन के दमन और भारतीयों के साथ होने वाले अन्याय को प्रमुखता से उठाया.
सरकारी अभिलेख के अनुसार, 1914 में प्रेस कानून के तहत इस समाचार पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद मोहम्मद अली जौहर ने उर्दू पत्रकारिता के माध्यम से अपनी आवाज जारी रखी. इससे पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार की निगरानी से बचना किसी एक भाषा के पत्रकारों के लिए आसान नहीं था.
आज के समय में खबरें कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं. लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दौर में समाचार पत्र ही जनता तक राजनीतिक जानकारी पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम थे.
किसान अपने क्षेत्र की समस्या के बारे में अखबार में पढ़ता था. शहर का पाठक दूसरे प्रांत में चल रहे आंदोलन के बारे में जानता था. छात्र राजनीतिक लेख पढ़कर आंदोलनों से जुड़ते थे. इस तरह स्थानीय समस्याएं राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने लगीं.
भारत सरकार के अभिलेखों में भी माना गया है कि भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों ने स्थानीय समस्याओं और शिकायतों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यही वजह थी कि अंग्रेजी सरकार को डर था कि अखबारों के जरिए सरकार के खिलाफ असंतोष और राजनीतिक चेतना तेजी से फैल सकती है.
अंग्रेजों का सबसे बड़ा हथियार था आर्थिक दबाव. अखबारों को रोकने के लिए हर बार सीधे प्रतिबंध लगाना जरूरी नहीं था. सरकार जमानत राशि मांग सकती थी. जमानत जब्त कर सकती थी. छापेखाने की मशीनें जब्त कर सकती थी. प्रकाशन पर रोक लगा सकती थी.
संपादक या प्रकाशक पर मुकदमा चला सकती थी. यानी पत्रकारिता को आर्थिक और कानूनी दोनों तरह से कमजोर करने की कोशिश की जाती थी. 1878 के कानून के दौरान कई समाचार पत्रों ने इसका विरोध किया. सरकारी अभिलेखों के अनुसार, सोमप्रकाश जैसे समाचार पत्रों ने कानून की उन व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए जिनके कारण उन्हें भारी जमानत राशि जमा करनी पड़ सकती थी. अंततः जमानत की मांग के बाद उसका प्रकाशन बंद हो गया.
फिर भी अखबारों ने हार नहीं मानी, अंग्रेजी सरकार जितना नियंत्रण बढ़ाती गई, राष्ट्रवादी पत्रकार उतने ही नए रास्ते तलाशते गए. कहीं अखबार की भाषा बदल गई तो कहीं नया समाचार पत्र शुरू हुआ. कहीं संपादक ने अदालत में सरकारी कार्रवाई का सामना किया. कहीं आर्थिक नुकसान के बावजूद प्रकाशन जारी रखा गया.
यही वजह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भारतीय पत्रकारिता को केवल समाचार देने वाला माध्यम नहीं माना जा सकता. यह राजनीतिक जागरण और जनमत निर्माण का एक बड़ा हथियार बन चुकी थी.
भारतीय समाचार पत्रों ने स्वतंत्रता आंदोलन में मुख्य रूप से तीन बड़े काम किए.
इसी कारण भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को अंग्रेजी सरकार केवल समाचार पत्र नहीं समझती थी. उसके लिए वे राजनीतिक चेतना फैलाने का माध्यम बन चुके थे.
भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में उन पत्रकारों और समाचार पत्रों की भूमिका को भूलना आसान है, जिन्होंने बिना हथियार के अंग्रेजी शासन को चुनौती दी.
अमृत बाजार पत्रिका ने भाषा बदलकर रास्ता निकाला. हिंदी प्रदीप ने कानून के खिलाफ आवाज उठाई. अल्मोड़ा अखबार ने पहाड़ के लोगों की समस्याओं को सामने रखा. केसरी के लेखों ने तिलक को जेल तक पहुंचाया. बंदे मातरम् ने स्वदेशी आंदोलन को आवाज दी और द कॉमरेड पर प्रतिबंध के बावजूद मोहम्मद अली जौहर ने पत्रकारिता का रास्ता नहीं छोड़ा.
इन घटनाओं को साथ रखकर देखें तो स्वतंत्रता संग्राम का एक कम चर्चित चेहरा सामने आता है. अंग्रेजों के पास कानून और जेल की ताकत थी, लेकिन भारतीय पत्रकारों के पास कलम थी. और यही कलम लोगों को यह समझाने में कामयाब रही कि अंग्रेजी शासन की नीतियों पर सवाल उठाना भी आजादी की लड़ाई का हिस्सा है.