रूसी तेल पर सस्पेंस, US ने कहा सप्लाई बंद! दिल्ली की चुप्पी के क्या हैं कूटनीतिक मायने?
भारत-अमेरिका के बीच नए व्यापारिक समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है. इससे रूसी तेल खरीद पर लगे दंडनीय टैरिफ हटेंगे और द्विपक्षीय निर्यात बढ़ेगा. हालांकि, रूसी तेल के भविष्य और समझौते के संतुलन पर अब भी सवाल कायम हैं.
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 फरवरी को एक ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते के फ्रेमवर्क की पुष्टि की. इस समझौते का मुख्य केंद्र रूसी तेल खरीद के कारण भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत दंडनीय टैरिफ को हटाना है. यह रणनीतिक मोड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बना देगा. यह कदम न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोलेगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाएगा.
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर का विशाल वैश्विक बाजार खोलने वाला साबित होगा. अमेरिका अब भारतीय दवाओं, रत्नों और विमान के कलपुर्जों पर टैरिफ को शून्य करने पर सहमत हो गया है. इसके बदले में, भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद और विमान खरीदने के लिए करीब 500 अरब डॉलर का निवेश करेगा. भारत की आत्मनिर्भरता को कृषि क्षेत्र में प्राथमिकता दी गई है, जिससे हमारे घरेलू किसानों के हितों की रक्षा होगी.
रूसी तेल आयात को लेकर स्पष्टता की कमी!
समझौते के फ्रेमवर्क में रूसी तेल आयात को लेकर स्पष्टता की कमी एक बड़ा मुद्दा है. अमेरिकी आदेशों में संकेत है कि भारत को रूसी तेल की खरीद बंद करनी होगी, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है. प्रवक्ता के अनुसार, स्रोतों का विविधीकरण बाजार की स्थितियों पर निर्भर करेगा. यह कूटनीतिक संतुलन भारत की स्वायत्त विदेश नीति का कड़ा परीक्षण करेगा. सरकार का मानना है कि आयात में कमी वैश्विक गतिशीलता का परिणाम है.
टैरिफ संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव
भारत पर अगस्त 2025 से कुल 50 प्रतिशत टैरिफ प्रभावी था, जिसमें रूसी तेल के कारण लगा 25 प्रतिशत दंडनीय हिस्सा भी शामिल था. अब इस दंडात्मक हिस्से को हटा दिया गया है, जिससे केवल 25 प्रतिशत टैरिफ शेष बचा है. संयुक्त बयान के मुताबिक, अंतरिम समझौते की सफलता के बाद इसे 18 प्रतिशत तक लाया जा सकता है. यह बदलाव 7 फरवरी से लागू हो गया है. निर्यातकों के लिए यह आर्थिक राहत एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन की तरह कार्य करेगी, जिससे भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी.
विपक्ष के संदेह और आलोचना
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने इस फ्रेमवर्क को असंतुलित और अपारदर्शी करार दिया है. उनका तर्क है कि यह एक पूर्ण समझौता नहीं, बल्कि केवल अंतरिम व्यवस्था का एक ढांचा मात्र है. विपक्ष के अनुसार, समझौते की शर्तें अमेरिका के पक्ष में अधिक झुकी हुई प्रतीत होती हैं. चिदंबरम ने सवाल उठाया है कि जब विवरणों में इतनी अस्पष्टता है, तो इसे जश्न का विषय क्यों माना जा रहा है. हालांकि, पीएम मोदी और गोयल ने इसे दोनों देशों के बीच संबंधों की गहराई बताया है.