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India Daily

भारत-EU 5 साल के लिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर हुए सहमत, जानें क्या होगा फायदा?

मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) दर्जा मिलने से आयात-निर्यात पर समान शुल्क और नियम लागू होंगे. यानी किसी एक देश को दी गई छूट दूसरे से नहीं छिपाई जाएगी.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
भारत-EU 5 साल के लिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर हुए सहमत, जानें क्या होगा फायदा?
Courtesy: X

भारत-EU 5 साल के लिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर हुए सहमतभारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते का मसौदा सामने आया है. इसके अनुसार, समझौता लागू होने के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे को पांच वर्षों के लिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ यानी सबसे तरजीह देश का दर्जा देंगे. इसका अर्थ है कि व्यापार के मामले में दोनों एक-दूसरे के साथ भेदभाव नहीं करेंगे और समान रियायतें देंगे. इसे द्विपक्षीय रिश्तों में बड़ा कदम माना जा रहा है.

क्या होगा ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का असर

मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) दर्जा मिलने से आयात-निर्यात पर समान शुल्क और नियम लागू होंगे. यानी किसी एक देश को दी गई छूट दूसरे से नहीं छिपाई जाएगी. इससे व्यापार में पारदर्शिता बढ़ेगी और कंपनियों को भरोसा मिलेगा कि नियम अचानक नहीं बदलेंगे. विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यवस्था कारोबार को आसान बनाएगी और निवेश को बढ़ावा दे सकती है.

उच्चस्तरीय बैठकों के बाद बनी सहमति

यह मसौदा उस प्रक्रिया का नतीजा है जो पिछले महीने नई दिल्ली में हुई लंबी बैठकों के बाद तेज हुई. यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कई दौर की चर्चा की थी. इन बैठकों का उद्देश्य समझौते के अंतिम रूप पर सहमति बनाना था.

बनेगा विशाल मुक्त व्यापार क्षेत्र

अगर यह समझौता लागू होता है तो करीब दो अरब लोगों को कवर करने वाला मुक्त व्यापार क्षेत्र बनेगा. यह क्षेत्र दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा दर्शाता है. लगभग 27 ट्रिलियन डॉलर के बाजार तक आसान पहुंच मिलने से व्यापार के नए रास्ते खुल सकते हैं. उद्योग जगत इसे अवसर के रूप में देख रहा है.

IMEC कॉरिडोर पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने IMEC कॉरिडोर को व्यापार और टिकाऊ विकास का अहम केंद्र बनाने की बात दोहराई है. उनका कहना है कि बेहतर संपर्क और बुनियादी ढांचे से माल की आवाजाही तेज होगी. इससे भारत और यूरोप के बीच आर्थिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं.