IMF New Conditions On PAK: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा हाल ही में पाकिस्तान को दिए गए 1 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली को राहत देने का संकेत तो दिया है, लेकिन इसके पीछे छिपे कई गंभीर सवाल अब वैश्विक चर्चा का केंद्र बन चुके हैं. क्या IMF अनजाने में एक ऐसे देश को समर्थन दे रहा है, जिसकी संस्थाएं वैश्विक आतंकवाद से जुड़ी रही हैं?
इस बहस का मुख्य बिंदु पाकिस्तान सेना के मौजूदा प्रवक्ता, लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी हैं. आलोचक इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि IMF और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सुल्तान बशीरुद्दीन महमूद के पुत्र हैं — वही पाक वैज्ञानिक जिनके आतंकवादी संगठनों से गहरे संबंध रहे हैं.
बशीरुद्दीन महमूद, जिन्होंने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बाद में उन्होंने "उम्मा तामीर-ए-नौ" (UTN) नामक संगठन की स्थापना की. यह संगठन अल-कायदा और तालिबान को तकनीकी और वित्तीय समर्थन देने के आरोप में UN द्वारा प्रतिबंधित किया गया.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट के अनुसार, 2001 में महमूद ने ओसामा बिन लादेन और अयमान अल-जवाहिरी से कंधार में मुलाकात की थी और परमाणु तकनीक से जुड़ी जानकारी साझा की थी.
इस पृष्ठभूमि में एक अहम सवाल उठता है: क्या IMF को बिना कठोर शर्तों और जांच के ऐसे देश को सहायता देनी चाहिए? क्या यह आर्थिक सहायता अप्रत्यक्ष रूप से उन नेटवर्क्स को मजबूती नहीं देती, जो कट्टरपंथ को पोषित करते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है, 'यह केवल व्यक्ति विशेष की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि यह संस्थागत सोच की स्वीकार्यता का मामला है.' IMF की यह उदारता भविष्य में वैश्विक सुरक्षा को संकट में डाल सकती है.
हाल ही में AQIS द्वारा भारत को मिली धमकियों ने एक बार फिर इस बहस को जीवंत कर दिया है. यह संकेत देता है कि पाकिस्तान की नीतिगत संरचनाएं आज भी चरमपंथ के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकी हैं.
IMF को पाकिस्तान को दी जाने वाली किसी भी आर्थिक मदद को लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैश्विक शांति के मूल्यों से जोड़ना चाहिए. सिर्फ पैसा देना समाधान नहीं है, जवाबदेही तय करना भी जरूरी है.