1947 में देश स्वतंत्र हुआ तो नई शासन व्यवस्था खड़ी करने के साथ कई महत्वपूर्ण फैसले लेने की चुनौती भी सामने थी. संविधान निर्माण की प्रक्रिया के बीच यह सवाल भी अहम बन गया कि केंद्र सरकार के आधिकारिक कामकाज के लिए किस भाषा को अपनाया जाए.
भारत की खासियत उसकी भाषाई विविधता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं. ऐसे में सरकारी कामकाज के लिए किसी एक भाषा का चयन करना आसान निर्णय नहीं था. संविधान सभा में इस विषय पर सदस्यों के बीच अलग-अलग राय सामने आई. चर्चा का केंद्र केवल हिंदी को राजभाषा बनाए जाने का सवाल नहीं था, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण था कि फैसले में देश के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों की भावनाओं और विविधता का पूरा ध्यान रखा जाए.
भाषा के मुद्दे पर संविधान सभा में लंबे समय तक विचार-विमर्श चलता रहा. कई बैठकों में राजभाषा और सरकारी कामकाज में भाषा के इस्तेमाल से जुड़े प्रावधानों पर चर्चा हुई. सितंबर 1949 में यह बहस अपने अंतिम दौर में पहुंची. 12 सितंबर से 14 सितंबर के बीच संविधान सभा में राजभाषा के मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई.
इसके बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ संघ की राजभाषा स्वीकार करने का फैसला हुआ. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि अंग्रेजी का इस्तेमाल तुरंत बंद कर दिया गया. व्यवस्था में बदलाव के लिए एक संक्रमणकाल रखा गया और इस दौरान सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति बनी रही. बाद में संसद ने कानून के जरिए अंग्रेजी के इस्तेमाल से जुड़ी व्यवस्था को आगे भी जारी रखा.
हिंदी दिवस पर अक्सर राष्ट्रभाषा और राजभाषा को लेकर भ्रम देखने को मिलता है. संवैधानिक तौर पर हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है. संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा बताया गया है. संविधान के भाग 17 में संघ की राजभाषा से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं. अनुच्छेद 343 में स्पष्ट किया गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और इसकी लिपि देवनागरी होगी. इसलिए संवैधानिक संदर्भ में हिंदी के लिए राजभाषा शब्द का इस्तेमाल किया जाना ही उचित है. 14 सितंबर 1949 को लिए गए ऐतिहासिक निर्णय की याद में हिंदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई.