भारतीय राजनीति में नारे सिर्फ कुछ शब्दों का मेल नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने आंदोलनों को आवाज देने, जनता को जोड़ने और कई बार चुनावी राजनीति की दिशा तय करने का काम किया है. हाल के दिनों में दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हुए प्रदर्शनों में 'एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा' जैसे नारे चर्चा में आए.
दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों की छात्राओं के प्रदर्शनों में 'रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं', 'नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की', 'फूल नहीं, चिंगारी है, ये भारत की नारी है' और 'ठंडे समोसे गर्म करो, मर्द जात शर्म करो' जैसे नारे भी सुनाई दिए. इन नारों की भाषा पारंपरिक राजनीतिक नारों से अलग जरूर है, लेकिन विरोध दर्ज कराने का उद्देश्य स्पष्ट दिखाई देता है.
अगर भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो नारों की भाषा हमेशा गंभीर और मर्यादित नहीं रही है. आजादी के आंदोलन में 'वंदे मातरम्', 'इंकलाब जिंदाबाद', 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' और 'करो या मरो' जैसे नारों ने जनता में जोश पैदा किया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस का 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' भी इसी दौर का ऐसा आह्वान था, जिसने लोगों के भीतर त्याग और संघर्ष की भावना को मजबूत किया.
इन नारों की खासियत यह थी कि उनके पीछे वास्तविक जोखिम मौजूद था. आंदोलनकारियों को जेल, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और फांसी तक का सामना करना पड़ा. इसलिए उस दौर में नारा केवल गुस्सा व्यक्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि संघर्ष और बलिदान का संकल्प भी था.
आजादी के बाद नारों ने चुनावी राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. "गरीबी हटाओ" ने राजनीतिक संदेश को बेहद छोटे और यादगार रूप में जनता तक पहुंचाया, जबकि "जय जवान, जय किसान" ने देश की सुरक्षा और खाद्य जरूरतों को एक साथ सामने रखा. डॉ. राममनोहर लोहिया से जुड़े "संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ" जैसे नारे ने सामाजिक प्रतिनिधित्व और पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी के सवाल को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया.
जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भी नारों की अहम भूमिका रही. 'अंधकार में एक प्रकाश, जयप्रकाश, जयप्रकाश' और 'गूंजे धरती और आकाश, देश का नेता जयप्रकाश' जैसे नारों में तुक और लय के साथ सत्ता विरोध तथा व्यवस्था परिवर्तन की भावना दिखाई देती थी. श्रमिक आंदोलनों में 'जीने लायक वेतन दो, वरना गद्दी छोड़ दो' जैसे नारों ने सीधे मांग को जनता तक पहुंचाया.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारों ने कई बार सामाजिक और जातीय टकराव को भी तेज किया. 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको जूते मारो चार' जैसे नारे बेहद आक्रामक सामाजिक संदेश के लिए जाने गए. वहीं 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम' जैसे नारे ने चुनावी गठबंधन और राजनीतिक संघर्ष को भाषा दी. बसपा की राजनीति में बाद के दौर में 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है' और 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' जैसे नारों के जरिए राजनीतिक भाषा में बदलाव भी दिखाई दिया.
सोशल मीडिया के दौर ने नारों की दुनिया को और बदल दिया है. पहले नारे भीड़ तक पहुंचने के लिए बनाए जाते थे, अब उनका लक्ष्य कैमरा और सोशल मीडिया भी है. किसी नारे की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने लोग उसे दोहरा रहे हैं, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह कितनी तेजी से वायरल हुआ.