लेह-लद्दाख में भीषण गर्मी पड़ रही है. तापमान 32 डिग्री सेल्सियस के ऊपर पहुंच गया है. हीट वेव के कारण बड़ी संख्या में फ्लाइट्स रद्द हो रहे हैं. चालक दल चिलचिलाती गर्मी से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पिछले तीन दिनों में कुल 12 उड़ानें रद्द की गई हैं. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे कश्मीर और लद्दाख में पानी की किल्लत होने लगी है. लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है. कई गांव पीने के पानी नहीं मिल रहे है, क्योंकि पानी के श्रोत रहे ग्लेशियर अब नहीं रहे.
पानी की कमी से खेती पूरी तरह से चौपट हो गई है. खेत पानी के बिना सुखे पड़े हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले छह दशकों में इस क्षेत्र के ग्लेशियरों में 25 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि मामूली जलवायु परिवर्तन के बावजूद सदी के अंत तक 48 प्रतिशत ग्लेशियर लुप्त हो सकते हैं. वैज्ञानिक इसे आने वाली बड़ी त्रासदी के रूप में देख रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन से हिमालय की संवेदनशील पर्यावरणीय व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो गए हैं. ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था,पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ा है. अगली सदी के आख़िर तक हिमालय के ग्लेशियरों का एक तिहाई हिस्सा ख़त्म होने की आशंका जताई गई है. अगर ऐसा होता है तो एशिया भर के नदियों के जल स्तर में बड़े बदलाव आएंगे.
लद्दाख की जलवायु ठंडी और शुष्क है. यहां औसतन 86.8 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है. इसलिए इस क्षेत्र के 80 फीसदी किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए ग्लेशियर पर निर्भर रहते हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों में बर्फबारी में कमी आई है. पहाड़ों पर बर्फ कम हो गए हैं. पहाड़ के नदी-नलों में पानी कम आते हैं. आईएमडी के निदेशक सोनम लोटस ने कहा कि तापमान में तेज वृद्धि, वह भी लद्दाख में वास्तव में ये चिंता का विषय है. ग्लेशियर हमारे प्राकृतिक संसाधन हैं और बहुत मूल्यवान हैं. हमें उस ग्लेशियर से पानी मिलता है, इसलिए यदि तापमान इस तरह बढ़ता है जब लद्दाख का 30 डिग्री मैदानी इलाकों के 40 डिग्री के समान है तो तीव्र गर्मी से बर्फ के पिंड तेजी से पिघलेंगे.
लद्दाख के जलवायु परिवर्तन के संकेत कई साल पहले से मिलने लगे हैं. जो पहाड़ कभी ग्लेशियर से ढके रहते थे वो अब बंदर हो गए हैं. स्थानीय लोगों पानी के लिए कृत्रिम ग्लेशियरों जैसे बर्फ के स्तूपों का निर्माण कर रहे हैं.