नई दिल्ली: लंबे इंतजार के बाद देश की 16वीं जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. कोविड महामारी के कारण 2021 में टली यह गणना अब 1 अप्रैल से डिजिटल स्वरूप में शुरू होगी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026-27 में इसके लिए भारी फंड का प्रावधान किया है. यह राष्ट्रीय अभियान न केवल आबादी के आंकड़े जुटाएगा, बल्कि भविष्य की सरकारी योजनाओं और नीतियों के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल डेटाबेस के रूप में भी काम करेगा.
यूनियन बजट में जनगणना 2027 के लिए 6,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. यह राशि पिछले संशोधित अनुमानों से छह गुना ज्यादा है. कैबिनेट ने इस पूरी परियोजना के लिए कुल 11,718 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) इस फंड का उपयोग नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर और जनगणना संबंधी अन्य कार्यों के लिए करेगा. बजट का यह बड़ा हिस्सा दर्शाता है कि सरकार इस डेटा को लेकर कितनी गंभीर और सक्रिय है.
इस बार की जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है. यह पूरी तरह डिजिटल होगी और नागरिकों को 'सेल्फ-एन्यूमरेशन' का विकल्प मिलेगा. इसका मतलब है कि लोग खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकेंगे. सबसे बड़ा बदलाव जाति गणना को शामिल करना है. यह पहल सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने में मदद करेगी. सरकार ने इसे आधुनिक बनाने के लिए नवीनतम तकनीकी उपकरणों और डिजिटल डिवाइस का बड़े पैमाने पर उपयोग करने का निर्णय लिया है.
जनगणना का कार्य दो मुख्य चरणों में संपन्न होगा. पहले चरण में 'हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन' (HLO) के तहत घरों की स्थिति और सुविधाओं से जुड़े 33 सवाल पूछे जाएंगे. दूसरा चरण 'जनसंख्या गणना' का होगा, जो 1 फरवरी 2027 से शुरू होगा. इसी चरण में प्रत्येक व्यक्ति का सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विवरण दर्ज किया जाएगा. इसी दौरान जातिगत आंकड़े भी जुटाए जाएंगे ताकि देश की विविधता का सटीक चित्रण सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हो सके.
भारत की भौगोलिक विविधताओं को ध्यान में रखते हुए जनगणना के लिए अलग-अलग संदर्भ तिथियां तय की गई हैं. लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों के लिए 1 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित है. वहीं, देश के बाकी हिस्सों के लिए यह संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 रखी गई है. इस रणनीति से यह सुनिश्चित होगा कि कठिन मौसम वाले क्षेत्रों में भी गणना का काम बिना किसी बाधा के समय पर पूरा किया जा सके.
इस राष्ट्रीय अभ्यास को सफल बनाने के लिए करीब 30 लाख गणनाकर्ता और पर्यवेक्षक मैदान में उतरेंगे. उनके साथ लगभग 1.3 लाख जनगणना अधिकारी पूरे देश में डेटा एकत्र करेंगे. ये सभी अधिकारी डिजिटल डिवाइस की मदद से जानकारी दर्ज करेंगे जिससे डेटा प्रोसेसिंग तेज और पारदर्शी होगी. यह विशाल डेटाबेस विकसित भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा और भविष्य की कल्याणकारी नीतियों के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करेगा.