SIR Dispute: चुनाव आयोग यानी ECI ने सुप्रीम कोर्ट से साफ कर दिया है कि विशेष गहन संशोधन (SIR) कब कराया जाए, यह अदालत तय नहीं कर सकती. आयोग ने शुक्रवार को दायर अपने हलफनामे में कहा कि मतदाता सूची तैयार करना और उसमें संशोधन करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, और इसमें किसी अन्य संस्था का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा.
आयोग ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 324, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत मतदाता सूची से जुड़ी सारी शक्तियां केवल उसके पास निहित हैं. अदालत द्वारा किसी तय समयावधि में संशोधन का आदेश देना आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. कानून में कहीं भी निश्चित समयावधि का उल्लेख नहीं है. आयोग हालात और आवश्यकता के अनुसार सारांश, गहन या विशेष संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है.
यह हलफनामा अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर दाखिल किया गया. याचिका में मांग की गई थी कि देशभर में नियमित अंतराल पर विशेष संशोधन हों, ताकि अवैध प्रवासियों का नाम मतदाता सूची में शामिल न हो सके. उपाध्याय का आरोप है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार से आए घुसपैठियों के कारण मतदाता सूचियों में गड़बड़ी हो रही है और कई राज्यों में जनसंख्या असंतुलन दिखाई देता है. उन्होंने दावा किया कि बिहार की हर विधानसभा सीट पर 8 से 10 हजार फर्जी या दोहराए गए नाम मौजूद हो सकते हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चल रही विशेष संशोधन प्रक्रिया पर विपक्षी INDIA गठबंधन ने भी सवाल उठाए हैं. विपक्ष का आरोप है कि आयोग मतदाता सूची को पक्षपातपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहा है. आयोग ने इसका जवाब देते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को विरोध प्रदर्शन करने के बजाय सही मतदाताओं की मदद करनी चाहिए.
इस बीच, 8 सितंबर को न्यायमूर्ति सूर्या कांत की पीठ ने आदेश दिया था कि आधार कार्ड को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए 12वें वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाए. आयोग ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन अदालत ने कहा कि भले ही आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, फिर भी यह पहचान और निवास का वैध साक्ष्य है.
आयोग ने कोर्ट को यह भी बताया कि 1 जनवरी 2026 की पात्रता तिथि मानते हुए विशेष गहन संशोधन पहले ही तय कर दिया गया है. सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को इसके लिए पूर्व तैयारी गतिविधियां शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं. साथ ही 10 सितंबर को दिल्ली में सीईओ सम्मेलन आयोजित कर तैयारी की समीक्षा भी की गई. अंत में आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन संशोधन का समय और तरीका तय करना उसका विशेषाधिकार है. इसी आधार पर आयोग ने याचिका खारिज करने की मांग की.