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India Daily

चुनाव आयोग की SIR को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, DMK बोली- मताधिकार से वंचित हुए असली वोटर्स

देश के 12 राज्यों में मंगलवार से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू होनेवाला है, लेकिन इससे पहले DMK ने EC की इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए हैं.

Kanhaiya Kumar Jha
चुनाव आयोग की SIR को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, DMK बोली- मताधिकार से वंचित हुए असली वोटर्स
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: देश के 12 राज्यों में मंगलवार से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू हो रहा है. इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना है ताकि आगामी चुनावों के लिए सही और ताजा रिकॉर्ड तैयार किया जा सके. लेकिन इस बीच तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (DMK) ने इस पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

बिना उचित प्रक्रिया के मतदाताओं के नाम काटने के आरोप

डीएमके का आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए मनमाने ढंग से लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए हैं. पार्टी का कहना है कि इससे कई असली मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो गए हैं. डीएमके के संगठन सचिव आर. एस. भारती ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. उन्होंने अदालत से इस मामले पर शीघ्र सुनवाई की मांग की है.

चुनाव आयोग पर नियमों की अनदेखी के आरोप

पार्टी ने अपनी याचिका में कहा है कि संविधान ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय की है, लेकिन चुनाव आयोग ने उसका पालन नहीं किया. डीएमके का कहना है कि आयोग की जल्दबाजी और लापरवाही के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम गलती से हटा दिए गए, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं.

SIR के लिए कम समय देने का आरोप

याचिका में यह भी कहा गया है कि आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए बहुत कम समय दिया और जरूरी दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया में भी कई कमियां रहीं. इससे कई पात्र मतदाताओं के नाम भी हट गए. पार्टी का कहना है कि यह स्थिति मतदाताओं के अधिकारों का हनन करती है और चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है.

चुनाव आयोग के खिलाफ मुखर है विपक्ष

उधर, बिहार से जुड़े इसी तरह के एसआईआर मामले पर भी मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. विपक्षी दलों ने भी चुनाव आयोग के इस कदम पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इतने कम समय में लाखों रिकॉर्ड की जांच करना संभव नहीं है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है.

कुल मिलाकर, डीएमके की याचिका ने इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है और अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है.