BJP का बेड़ा पार करेगा डेरा? समझिए क्या है हरियाणा और पंजाब की डेरा पॉलिटिक्स
Dera Politics: लोकसभा चुनाव की वोटिंग से ठीक पहले डेरा सच्चा सौदा ने हरियाणा में बीजेपी के समर्थन का ऐलान करके हर किसी को चौंका दिया है. पिछली बार इस डेरे ने मौन साधे रखा था.
हरियाणा और पंजाब में डेरों का दबदबा हर मामले में है. चाहे किसान आंदोलन हो, आरक्षणों से जुड़ा आंदोलन हो या फिर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हों, हर बार डेरों की सहमति या असहमति बेहद अहम हो जाती है. ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले डेरा सच्चा सौदा का भारतीय जनता पार्टी (BJP) को समर्थन करने का ऐलान बेहद अहम माना जा रहा है. रेप केस में दोषी और डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम की सहयोगी हनीप्रीत ने अब हरियाणा की लोकसभा सीटों पर अपने लोगों की टीम उतार दी है कि वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी की मदद करें. इससे पहले हरियाणा में बीजेपी की सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि वह चुनावी फायदों के लिए राम रहीम को पैरोल और फरलो देती रही है.
हरियाणा के साथ-साथ डेरों की ताकत यह है कि हर पार्टी के नेता उनके चक्कर लगाते रहे हैं. बीते कुछ सालों में डेरा सच्चा सौदा सबसे ताकतवर बनकर उभरा है. इसकी वजह भी है कि रेप केस में दोषी साबित होने के बावजूद राम रहीम के समर्थक पहले की तरह ही उसके पीछे खड़े दिखते हैं. ऐसे में राजनीतिक दल भी इन डेरों को नाराज करने का जोखिम कभी नहीं लेना चाहते हैं. आइए समझते हैं कि इस बार के लोकसभा चुनाव में ये डेरे कितना असर डाल सकते हैं.
हरियाणा की 10 सीटों पर है टक्कर
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हरियाणा में पिछली बार यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा ने बीजेपी का समर्थन किया था. हालांकि, 2017 में राम रहीम को सजा होने के बाद 2019 में उसने खुला समर्थन नहीं किया. हालांकि, पार्टियों के नेता चोरी-छिपे डेरे का आशीर्वाद लेने पहुंचते रहे. हरियाणा के सिरसा, हिसार, करनाल, रोहतक, कैथल और अंबाला में डेरा सच्चा सौदा के समर्थक अच्छी-कासी संख्या में हैं. ऐसे में अचानक डेरे की ओर से हुए ऐलान से बीजेपी की बांछें खिल गई हैं.
दरअसल, सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि कुछ दिन पहले बीजेपी के नेताओं ने हनीप्रीत सिंह से मुलाकात की थी. तब हनीप्रीत ने नेताओं से समय मांगा था. अब शुक्रवार को हरियाणा में चुनाव प्रचार खत्म होते ही डेरा सच्चा सौदा ने 15 सदस्यीय कमेटी की ड्यूटी लगाई है. हरियाणा की सभी 10 सीटों पर 25 मई को वोट डाले जाने हैं. ऐसे में कांग्रेस-AAP के गठबंधन और एंटी इन्कम्बेंसी का सामना कर रही बीजेपी ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली होगी.
क्या है डेरा पॉलिटिक्स?
डेरे का शाब्दिक अर्थ एक जगह पर रहने से होता है. दिल्ली, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक विचारों वाले कई डेरे हैं. ये समय-समय पर अपने सम्मेलन करते हैं. इन डेरों के समर्थक डेरा प्रमुख की बातों का पालन भी करते हैं और चुनाव में भी डेरा प्रमुखों के कहे अनुसार ही वोट भी करते हैं. इनकी ताकत का अंदाजा इस हिसाब से लगाया जाता है कि साल 2017 में डेरा सच्चा सौदा के मुखिया राम रहीम को सजा हुई तो उसके समर्थकों ने हरियाणा से लेकर पंजाब तक जमकर हिंसा फैलाई. इसमें 38 लोगों की जान भी गई और सैकड़ों लोग बुरी तरह घायल हुए.
इस डेरे का प्रभाव हरियाणा के साथ-साथ पंजाब के भी कई जिलों में है. यही वजह है कि बीजेपी के अलावा, कांग्रेस, अकाली दल, AAP और जननायक जनता पार्टी के नेता भी समय-समय पर डेरों के चक्कर लगाते रहे हैं. पंजाब और हरियाणा में मौजूद दर्जनों डेरों के बीच आपसी मतभेद काफी ज्यादा हैं, यही वजह है कि अलग-अलग चुनाव में ये अलग-अलग पार्टियों के साथ देखे जाते हैं. उदाहरण के लिए 2002 और फिर 2007 में डेरा सच्चा सौदा ने कांग्रेस का समर्थन किया था. कई बार ये डेरे अलग-अलग सीट पर अलग-अलग पार्टियों के कैंडिडेट को समर्थन देते हैं और उनके समर्थन का फायदा भी देखने को मिलता रहा है.
कितने हैं डेरे?
हरियाणा और पंजाब को ही देखें तो कम से कम एक दर्जन डेरे ऐसे हैं जो कई जिलों में अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं. डेरा सच्चा सौदा, डेरा निरंकारी और डेरा सचखंड बल्लां इसमें प्रमुख हैं. इनके अलावा भी कई डेरे हैं जो स्थानीय स्तर पर काफी मजबूत हैं.
डेरा सच्चा सौदा
सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला डेरा सच्चा सौदा अब राम रहीम के नाम से जाना जाता है. राम रहीम के जेल जाने के बाद डेरे में आने वालों की संख्या बेहद कम हो गई लेकिन बीच-बीच में उसे पैरोल या फरलो मिलने के चलते उसके समर्थक फिर से जुड़ जाते हैं.
डेरा सचखंड बल्ला
पंजाब के जालंधर और होशियारपुर में अच्छा प्रभाव रखने वाला यह डेरा मुख्य रूप से रविदासी समुदाय को आकर्षित करता है. दलित सिख इसके प्रमुख समर्थक हैं. इसके समर्थक भी चुनाव में डेरे के मुताबिक ही वोटिंग करते रहे हैं.
डेरा निरंकारी
सिखों से टकराव की वजह से चर्चा में आने वाले निरंकारी समुदाय के लोग पंजाब से दिल्ली तक काफी सक्रिय रहे हैं. कई हिंसक घटनाओं में भी इनका नाम सामने आया है. राजनीतिक रूप से कम सक्रिय यह डेरा आंतरिक रूप से काफी संगठित और मजबूत माना जाता है.
राधा स्वामी ब्यास डेरा
साल 1891 में स्थापित हुए इस डेरे का कहना है कि वह राजनीतिक दलों से वास्ता नहीं रखता है. हालांकि, बीते कुछ सालों में राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी और चरणजीत सिंह चन्नी जैसे तमाम नेता इस डेरे में जाते रहे हैं. हां, इतना है कि यह डेरा कभी भी औपचारिक तौर पर अपने समर्थकों को किसी पार्टी विशेष के लिए वोट डालने को नहीं कहता है.