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India Daily

घट रही फर्टिलिटी रेट, क्या खतरे में है भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड? समझिए पूरा गणित

भारत का फर्टिलिटी रेट तेजी से नीचे आ रहा है, जिसकी वजह से डेमोग्राफिक डिविडेंड खतरे में पड़ सकता है. देश की विकास दर धीमी न पड़े, इसके लिए इस आंकड़े को समझना बेहद जरूरी है.

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Edited By: Shanu Sharma
घट रही फर्टिलिटी रेट, क्या खतरे में है भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड? समझिए पूरा गणित
Courtesy: ANI

दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों की लिस्ट में भारत नंबर वन पर है. लेकिन भविष्य में यह आंकड़ा शायद नीचे जा सकता है. क्योंकि पहली बार भारत की फर्टिलिटी रेट तेजी से नीचे आ रही ह, जिसके कारण भविष्य में बुजुर्गों की संख्या बढ़ सकती है और काम करने वाले युवा कम हो सकते हैं. जो किसी भी देश के लिए चिंता का विषय है.

किसी भी देश की ताकत उसके नागरिक और खास तौर पर काम करने वाले (वर्किंग) नागरिकों पर निर्भर करती है. देश में जितने ज्यादा लोग अर्थव्यवस्था में हिस्सा लेंगे, उतना ही ज्यादा देश की तरक्की भी होगी. अभी के समय ऐसा हो भी रहा है कि देश के युवा अर्थव्यवस्था को मेंटेन रखने में अपना अहम योगदान दे रहे हैं.

क्या होता है फर्टिलिटी रेट?

भारत में अभी जनसंख्या ज्यादा है और संसाधन कम हैं, जो कि एक बड़ी समस्या है, लेकिन जनसंख्या कम हो जाने से समस्या और भी ज्यादा बढ़ सकती है. इसलिए सभी देशों को अपने फर्टिलिटी रेट को कंट्रोल रखना जरूरी है. भारत में फर्टिलिटी रेट कुछ सालों से गिर रही है, लेकिन प्रजनन दर अभी भी प्रतिस्थापन स्तर के आसपास  है.

ताजा SRS रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की टोटल फर्टिलिटी रेट नीचे आ गई है. पहले यह रेट 2.1 बच्चे प्रति महिला थी, जो अब गिरकर 1.9 बच्चे प्रति महिला हो गई है. लंबे समय तक आबादी को स्थिर रखने के लिए इस रेट का स्थिर होना जरूरी है. TFR का मतलब है एक महिला के जीवनकाल में होने वाले बच्चों की औसत संख्या. जैसे कि 2000 के दशक में भारत की TFR लगभग 3.3 बच्चे प्रति महिला थी, जो अब महज 1.9 पर पहुंच चुकी है.

फर्टिलिटी रेट में क्यों आई कमी?

जानकारों का कहना है कि फर्टिलिटी में आई कमी के कई कारण हो सकते हैं. जैसे कि भारत की बढ़ती जनसंख्या को कंट्रोल करने के लिए चलाए जा रहे जागरुकता प्रोग्राम, बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च, शिक्षा और गर्भनिरोधक साधनों तक बेहतर पहुंच शामिल है. विशेषज्ञों का कहना है कि जब समाज में महिलाओं को शिक्षा और गर्भनिरोधक साधन मिलते हैं और उन्हें घर में फैसले लेने की आजादी मिलती है, तो अक्सर कुल फर्टिलिटी रेट गिर जाता है. इसके अलावा भी एक कारण है, जैसे कि पहले के समय में लोग बच्चे इसलिए ज्यादा करते थे क्योंकि अक्सर कई बच्चों की मृत्यु हो जाती थी.

भारत में शिशु मृत्यु दर भी काफी कम हुई है. यानी स्वास्थ्य व्यवस्था और जागरुकता बढ़ी है, जिसके कारण भी लोग कम बच्चे कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक जिन राज्यों में शिक्षा कम है वहां फर्टिलिटी रेट ज्यादा है और जहां शिक्षा का स्तर ऊंचा है वहां फर्टिलिटी रेट कम हो गया है. बिहार में अभी भी फर्टिलिटी रेट सबसे ज्यादा है, वहीं दिल्ली में यह संख्या सबसे कम है. लेकिन किसी भी देश को सही तरीके से चलाने के लिए इस रेट का बहुत ज्यादा कम होना भी खतरनाक है.

डेमोग्राफिक डिविडेंड क्या है?

बता दें कि 2005 में भारत की आबादी डेमोग्राफिक डिविडेंड के चरण में पहुंची. डेमोग्राफिक डिविडेंड का मतलब है कि देश की कामकाजी उम्र की आबादी (15-64 साल) का हिस्सा, बुजुर्गों और बच्चों की आबादी से ज्यादा होना. UNFPA के अनुसार, भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड 2055 तक रहने की उम्मीद है. इस दौर में किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है.

1960 के दशक में ऐसा जापान, सिंगापुर और हांगकांग के साथ हुआ, वहीं 1980 के दशक में चीन के लिए यह आंकड़ा काफी मददगार साबित हुआ. अभी के समय में भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढ़ रही है. लेकिन अगर अब फर्टिलिटी रेट बहुत ज्यादा नीचे जाता है तो बैलेंस बिगड़ सकता है. हालांकि भारत सरकार ने गिरते फर्टिलिटी रेट से निपटने के लिए अभी तक कोई देशव्यापी नीति घोषित नहीं की है, लेकिन अलग-अलग राज्य लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दक्षिण कोरिया का रेट लगभग 0.75 बच्चे प्रति महिला है, जो दुनिया भर में सबसे कम है.