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UPSC में लैटरल एंट्री के ऐलान से लेकर रद्द होने तक की क्या है कहानी, आखिर क्यों पलटी सरकार?

UPSC: बीते दिनों यूपीएससी ने लैटरल एंट्री के जरिए शीर्ष पदों पर होने वाली नियुक्तियों को लेकर एक विज्ञापन निकाला था. इस विज्ञापन के बाद पूरे देशभर में बवाल मच गया. सरकार के इस फैसले की चौतरफा आलोचना होने लगी. अब सरकार ने अपना फैसला वापस लेने का फैसला किया है. कार्मिक विभाग ने कहा है कि यूपीएससी को पत्र लिखकर लैटरल एंट्री के विज्ञापन को वापस लेने के लिए कहा गया है.

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UPSC में लैटरल एंट्री के ऐलान से लेकर रद्द होने तक की क्या है कहानी, आखिर क्यों पलटी सरकार?
Courtesy: Social Media

UPSC Lateral Entry:  यूपीएससी में लैटरल एंट्री के जरिए होने वाली नियुक्तियों पर केंद्र सरकार ने यू टर्न ले लिया है. केंद्रीय कार्मिक विभाग के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि UPSC को पत्र लिखकर फैसला वापस लेने के लिए कहा गया है. इस पत्र के बाद यूपीएससी औपचारिक तौर नोटिफिकेशन को वापस लेने का आदेश जारी करेगी. तीन दिन पहले ही संघ लोक सेवा आयोग ने ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टर लेवल के 45 पदों के लिए लैटरल एंट्री का विज्ञापन निकाला था. 

संघ लोक सेवा आयोग के इस विज्ञापन के बाद पूरे देश में बवाल मच गया था. विपक्ष ने विज्ञापन को संविधान, दलित और आदिवासी विरोधी बताया था. सरकार के सहयोगी दलों ने भी इस कदम की आलोचना की थी. 72 घंटे तक चली रस्साकसी के बाद आखिरकार केंद्र सरकार ने इस आदेश को वापस लेने का फैसला कर लिया.

आदेश वापस लेने की समझिए पूरी इनसाइड स्टोरी


UPSC का नोटिफिकेशन

17 अगस्त 2024 को संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने लैटरल एंट्री को लेकर एक विज्ञापन जारी किया था. इस विज्ञापन के मुताबिक, केंद्र सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों में 10 ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर के और 35 डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन निकाला था. आवेदन की अंतिम तारीख 17 सितंबर रखी गई थी. इन सभी पदों के लिए कार्यकाल 5 सालों के लिए था. हालांकि प्रदर्शन के आधार पर इसे घटाने और बढ़ाने का भी प्रावधान था. नोटिफिकेशन के अनुसार, पदों के लिए न्यूनतम और अधिकतम आयु सीमा क्रमश: 40 और 55 साल रखी गई थी. 


विपक्ष का विरोध 

17 अगस्त को लैटरल एंट्री का नोटिफिकेशन आने के बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसका विरोध किया. खड़गे ने एक्स पोस्ट में लिखा कि मोदी सरकार ने संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव के कम से कम 45 पदों को लैटरल एंट्री से भरने का विज्ञापन निकाला है. क्या इसमें SC, ST, OBC, EWS आरक्षण है? खड़गे ने आगे लिखा कि बीजेपी सरकार ने जानबूझकर नौकरियों में ऐसे लोगों को भर्ती कर रही है ताकि आरक्षण से दलित और आदिवासियों को इससे दूर रखा जा सके. अगले दिन राहुल गांधी ने भी सरकार के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. राहुल ने कहा कि नरेंद्र मोदी संघ लोक सेवा आयोग की जगह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं. 

उत्तर से लेकर दक्षिण तक आलोचना 

UPSC के इस नोटिफिकेशन पर उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक हर जगह विरोध शुरू हो गया. बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी इस फैसले को असंवैधानिक बताया. लोकसभा चुनावों में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही सपा ने भी सरकार के फैसले की आलोचना की. अखिलेश यादव ने यूपीएससी के नोटिफिकेशन का विरोध किया. तमिलनाडु की डीएमके ने भी लैटरल एंट्री का विरोध किया. मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि लैटरल एंट्री सोशल जस्टिस की अवधारणा पर सीधा हमला है. यह योग्य एससी, एसटी, ओबीसी के लोगों को शीर्ष पदों पर जाने से वंचित करता है. 

सहयोगी दलों का भी नहीं मिला साथ

विपक्षी दलों के साथ-साथ सहयोगी दलों ने भी नियुक्ति सिस्टम का विरोध किया है. केंद्र में लोजपा (आर ) के प्रमुख चिराग पासवान ने कहा कि हम इस फैसले का विरोध करते हैं. सही मंच पर हम इसे उठाएंगे. चिराग ने कहा कि सरकारी नौकरी में आरक्षण की जरूरत है वह होनी ही चाहिए. जेडीयू भी सरकार के इस फैसले से नाखुश थी. जेडीयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा कि इस फैसले से विपक्ष को एक मुद्दा मिल जाएगा. हम लोग शुरुआत से ही आरक्षण के हिमायती रहे हैं. सरकार को इस पर विचार करने की आवश्यकता है.