नई दिल्ली: आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर रील्स देखना एक आम आदत बन चुकी है. खासकर जब लोग बिस्तर पर लेटकर घंटों रील्स देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे खुद को रिलैक्स कर रहे हैं लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह आदत शरीर के लिए धीरे-धीरे बेहद खतरनाक साबित हो सकती है. डॉक्टरों का कहना है कि यह लत शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है.
सबसे पहले बात करें गर्दन और रीढ़ की हड्डी की. जब लोग लेटकर या झुककर मोबाइल देखते हैं, तो गर्दन और कंधे का एंगल गलत हो जाता है. इससे Text Neck Syndrome की समस्या होने लगती है. अमेरिकन ऑस्टियोपैथिक एसोसिएशन के अनुसार, झुककर मोबाइल देखने से गर्दन की हड्डियों पर लगभग 27 किलोग्राम तक का दबाव पड़ सकता है. यही कारण है कि बहुत से लोग सुबह उठते ही गर्दन और कंधे में दर्द महसूस करते हैं.
बिस्तर पर लेटकर रील्स देखने की एक और बड़ी समस्या है नींद की खराब गुणवत्ता. मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है, जो नींद को नियंत्रित करता है. JAMA Network Open की 2023 की एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग सोने से पहले फोन देखते हैं, उनकी नींद की गुणवत्ता खराब होती है और लंबे समय में इनसोमिया की शिकायत बढ़ जाती है.
रील्स का असर आंखों पर भी सीधा पड़ता है. National Eye Institute (US) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ब्लू लाइट आंखों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है. इससे आंखों में जलन, सूखापन और सिरदर्द जैसी दिक्कतें होने लगती हैं. जो लोग अंधेरे में रील्स देखते हैं, उनमें यह नुकसान और तेजी से बढ़ता है.
मानसिक स्वास्थ्य पर भी रील्स देखने का असर पड़ता है. रील्स से मिलने वाला त्वरित डोपामाइन दिमाग को थोड़े समय के लिए खुश करता है, लेकिन बार-बार ऐसा होने से व्यक्ति को इसकी आदत पड़ जाती है. Centers for Disease Control and Prevention (2025) की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार स्क्रीन टाइम चिंता, डिप्रेशन और ध्यान की कमी जैसी समस्याओं को जन्म देता है.
डॉक्टरों की सलाह है कि मोबाइल स्क्रीन टाइम दिन में एक घंटे से ज्यादा न रखें. सोने से पहले कम से कम एक घंटा मोबाइल से दूरी बनाएं. लेटकर नहीं बल्कि बैठकर मोबाइल का इस्तेमाल करें. हर 20 मिनट में आंखों को आराम दें और योग या स्ट्रेचिंग जैसी फिजिकल एक्टिविटी को दिनचर्या में शामिल करें.