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India Daily

Budget 2026: कैंसर समेत कई जानलेवा बीमारियों से लड़ने की तैयारी, बायोफार्मा सेक्टर को मजबूती के लिए मिलेंगे 10000 करोड़ रुपये

केंद्रीय बजट 2026 में सरकार ने गैर संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए बायोफार्मा शक्ति मिशन की घोषणा की है. इस योजना के तहत 5 साल में 10000 करोड़ रुपये निवेश कर भारत को बायो फार्मा का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

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Edited By: Babli Rautela
Budget 2026: कैंसर समेत कई जानलेवा बीमारियों से लड़ने की तैयारी, बायोफार्मा सेक्टर को मजबूती के लिए मिलेंगे 10000 करोड़ रुपये
Courtesy: India Daily

नई दिल्ली: केंद्रीय बजट 2026 पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने हेल्थकेयर और लाइफ साइंसेज सेक्टर के लिए भी एक जरूरी घोषणा की है. सरकार ने बायोफार्मा शक्ति नाम की नई पहल लॉन्च करने का ऐलान किया है. इस मिशन के लिए अगले 5 सालों में 10000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसका उद्देश्य भारत को एक मजबूत और आत्मनिर्भर बायो फार्मा हब के रूप में स्थापित करना है.

बायोफार्मा शक्ति एक खास कार्यक्रम है जो बायोलॉजिक दवाओं के रिसर्च इनोवेशन और मैन्युफैक्चरिंग पर केंद्रित होगा. यह पहल देश में तेजी से बढ़ रही गैर संक्रामक बीमारियों को ध्यान में रखकर बनाई गई है. सरकार का मानना है कि आने वाले दशकों में डायबिटीज कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियां भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पर सबसे बड़ा दबाव डालेंगी.

क्यों जरूरी है यह पहल?

भारत में बीमारियों का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. पहले जहां संक्रामक रोग बड़ी चुनौती थे अब उनकी जगह गैर संक्रामक बीमारियों ने ले ली है. हालिया आंकड़ों के मुताबिक देश में होने वाली कुल मौतों में से करीब 60 प्रतिशत मौतें गैर संक्रामक रोगों के कारण हो रही हैं. इनमें दिल की बीमारियां, डायबिटीज, कैंसर और सांस से जुड़ी पुरानी बीमारियां शामिल हैं.

गैर संक्रामक बीमारियां केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं हैं बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है. एक्सपर्ट का मानना है कि इन बीमारियों के कारण भारत को हर साल उत्पादकता में भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इलाज पर बढ़ता खर्च और कामकाजी उम्र के लोगों की सेहत खराब होना देश की ग्रोथ के लिए भी चुनौती बन रहा है.

डायबिटीज बना बड़ी चिंता

डायबिटीज के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे है. आंकड़ों के अनुसार करोड़ों भारतीय इस बीमारी से जूझ रहे हैं और आने वाले सालों में यह संख्या और बढ़ सकती है. समस्या केवल मरीजों की संख्या नहीं है बल्कि यह भी है कि बड़ी आबादी में डायबिटीज का समय पर पता नहीं चल पाता. इलाज मिलने के बावजूद बहुत से मरीजों में शुगर कंट्रोल नहीं हो पाता जिससे जटिलताएं बढ़ जाती हैं.

ऑटोइम्यून बीमारियां लंबे समय तक भारत में कम पहचानी गईं. लेकिन हाल के सालों में इनके मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. रुमेटाइड आर्थराइटिस ल्यूपस और टाइप वन डायबिटीज जैसी बीमारियां खासकर महिलाओं में तेजी से बढ़ी हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सही डेटा और राष्ट्रीय स्तर की रजिस्ट्री न होने के कारण इन बीमारियों का वास्तविक बोझ अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आया है.