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क्या अब नहीं आएगा बुढ़ापा? इंसान पर पहली बार हुई उम्र घटाने वाली दवा की टेस्टिंग

अमेरिका में ER-100 नामक जीन थेरेपी का पहला मानव परीक्षण शुरू हुआ है. इसका उद्देश्य उम्र बढ़ने से प्रभावित कोशिकाओं को अधिक युवा और सक्रिय बनाना है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
क्या अब नहीं आएगा बुढ़ापा? इंसान पर पहली बार हुई उम्र घटाने वाली दवा की टेस्टिंग
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: मेडिकल साइंस ने उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को समझने और उसे धीमा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. अमेरिका की बायोटेक कंपनी लाइफ बायोसाइंसेजने घोषणा की है कि उसके प्रयोगात्मक उपचार ER-100 का पहला मानव परीक्षण शुरू हो गया है. इस ट्रायल के तहत पहली बार एक मरीज की आंख में यह जीन थेरेपी इंजेक्ट की गई है. वैज्ञानिकों का उद्देश्य उम्र बढ़ने से प्रभावित कोशिकाओं को फिर से अधिक सक्रिय और स्वस्थ बनाना है.

यह परीक्षण मुख्य रूप से ग्लूकोमा और उम्र से जुड़ी आंखों की बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर किया जा रहा है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को युवा अवस्था जैसी कार्यक्षमता प्रदान कर सकती है, जिससे आंखों की रोशनी बचाने या कुछ मामलों में सुधार करने की संभावना बन सकती है.

क्या है ER-100?

ER-100 एक पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग तकनीक पर आधारित है. इसमें विशेष जीनों को सक्रिय कर कोशिकाओं की उम्र बढ़ने से जुड़ी प्रक्रियाओं को आंशिक रूप से पीछे ले जाने का प्रयास किया जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार इसका उद्देश्य कोशिका की मूल पहचान को बदले बिना उसकी कार्यक्षमता को बेहतर बनाना है.

कहां-कहां के मरीज हुए शामिल?

इस ट्रायल में सीमित संख्या में मरीज शामिल किए गए हैं. बोस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और चार्ल्सटन के विशेष चिकित्सा केंद्रों में मरीजों की निगरानी की जा रही है. पहले चरण का मुख्य लक्ष्य यह पता लगाना है कि यह उपचार इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं और इसकी उचित खुराक क्या होनी चाहिए.

इस शोध की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि डेविड सिंक्लेयर द्वारा प्रस्तुत एजिंग की इन्फॉर्मेशन थ्योरी से जुड़ी है. इस सिद्धांत के अनुसार उम्र बढ़ने का एक कारण यह है कि कोशिकाएं समय के साथ अपने जैविक निर्देशों तक प्रभावी पहुंच खो देती हैं. नई थेरेपी इन निर्देशों को फिर से सक्रिय करने का प्रयास करती है.

कब मिली वैश्विक पहचान?

सेलुलर रीप्रोग्रामिंग की अवधारणा को वैश्विक पहचान तब मिली जब शिन्या यामानाका ने यामानाका फैक्टर्स की खोज की. इस खोज के लिए उन्हें 2012 में नोबेल पुरस्कार मिला था. हालांकि पूर्ण रीप्रोग्रामिंग से कैंसर और ट्यूमर का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए वैज्ञानिक पार्शियल रीप्रोग्रामिंग का सुरक्षित विकल्प विकसित कर रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है. फिलहाल यह दावा करना सही नहीं होगा कि इंसान अमर हो सकेगा या बुढ़ापा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा. यदि यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में अल्जाइमर, गठिया, हृदय रोग और अन्य उम्र संबंधी बीमारियों के उपचार में इसका उपयोग किया जा सकता है.