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संस्कृत पहले आई या उर्दू? शख्स ने पूछा तीखा सवाल तो भड़के जावेद अख्तर! बोले- 'यह कैसा सवाल है?'

जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में एक बार फिर अपनी बेबाकी और तर्कपूर्ण बातों से सबको प्रभावित किया. हाल ही में फेस्टिवल के एक सत्र में जब एक दर्शक ने उनसे पूछा कि संस्कृत पहले आई या उर्दू, तो जावेद अख्तर ने हैरानी जताते हुए जवाब दिया- 'ये कैसा सवाल है?'

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Edited By: Antima Pal
संस्कृत पहले आई या उर्दू? शख्स ने पूछा तीखा सवाल तो भड़के जावेद अख्तर! बोले- 'यह कैसा सवाल है?'
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मुंबई: जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में एक बार फिर अपनी बेबाकी और तर्कपूर्ण बातों से सबको प्रभावित किया. हाल ही में फेस्टिवल के एक सत्र में जब एक दर्शक ने उनसे पूछा कि संस्कृत पहले आई या उर्दू, तो जावेद अख्तर ने हैरानी जताते हुए जवाब दिया- 'ये कैसा सवाल है?' उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है, जबकि उर्दू अभी हजार साल भी पूरी नहीं हुई है.

संस्कृत पहले आई या उर्दू?

जावेद अख्तर ने कहा- 'संस्कृत हजारों साल पुरानी है, उर्दू तो कल की बच्ची है.' उन्होंने आगे बताया कि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा माना जाता है, उसके बाद संस्कृत आती है. उर्दू इस रेस में शामिल भी नहीं है. उनका कहना था कि भाषाओं की तुलना उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके महत्व, साहित्य और योगदान से होनी चाहिए. उन्होंने उर्दू को संस्कृत की छोटी बहन जैसी बताया, जो इससे प्रभावित होकर विकसित हुई.

भाषा का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं

यह सत्र 'इंडिया इन उर्दू, उर्दू इन इंडिया' और 'जावेद अख्तर: पॉइंट्स ऑफ व्यू' पर आधारित था, जहां जावेद अख्तर ने भाषा, परिवार, धर्मनिरपेक्षता और बॉलीवुड के बदलते ट्रेंड्स पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि भाषा का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, यह क्षेत्रीय होती है. उर्दू को उन्होंने क्षेत्रीय भाषा बताया, न कि धार्मिक. उन्होंने अपने बचपन की यादें साझा कीं कि कैसे उनकी मां और दादी ने उन्हें भाषा और संस्कृति से जोड़ा. सेक्युलरिज्म पर उन्होंने कहा कि इसका कोई क्रैश कोर्स नहीं होता, यह आसपास के माहौल से आता है.

'उर्दू को सिर्फ एक समुदाय की भाषा मानना गलत'

जावेद अख्तर ने उर्दू के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भारत में उर्दू को सिर्फ एक समुदाय की भाषा मानना गलत है. यह सबकी साझा विरासत है. फेस्टिवल में उन्होंने भाषाओं को हथियार बनाने के बजाय पुल बनाने की बात की. उनके इस जवाब ने सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी, जहां लोग उनकी स्पष्टवादिता की तारीफ कर रहे हैं.

जावेद अख्तर, जो 'शोले', 'दीवार', 'कल हो ना हो' जैसे गानों के लिए मशहूर हैं, हमेशा से भाषा और संस्कृति के मुद्दों पर मुखर रहे हैं. JLF 2026 में उनका यह सत्र दर्शकों के लिए यादगार रहा, जहां उन्होंने न सिर्फ सवालों के जवाब दिए, बल्कि गहरी सोच भी साझा की.