मुंबई: मर्दानी 3 का निर्देशन अभिराज मिनवाला ने किया है. यह फिल्म मर्दानी फ्रेंचाइजी का तीसरा अध्याय है, जिसमें एक बार फिर महिला शक्ति और अपराध की काली दुनिया को आमने सामने रखा गया है. कहानी भारत के अंदरूनी इलाकों में सेट है, जहां चाइल्ड ट्रैफिकिंग और भिखारी माफिया का खौफ फैला हुआ है.
रानी मुखर्जी द्वारा निभाया गया किरदार शिवानी शिवाजी रॉय, जिसे भारत की सबसे बेखौफ महिला पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता है, एक बार फिर कानून के लिए अपनी जान जोखिम में डालती नजर आती है.
कहानी की शुरुआत दो विचारधाराओं वाली महिलाओं से होती है. एक तरफ कानून की रक्षक शिवानी शिवाजी रॉय और दूसरी तरफ अपराध की दुनिया की रानी अम्मा. अम्मा का किरदार मल्लिका प्रसाद ने निभाया है, जो इस फिल्म की सबसे डरावनी ताकत बनकर उभरती हैं.
शिवानी को NIA की तरफ से एक बेहद संवेदनशील केस सौंपा जाता है. एम्बेसडर साहू की बेटी रूहानी और केयरटेकर की बेटी झिमली को अम्मा के आदमी किडनैप कर लेते हैं. रूहानी का टेस्ट पॉजिटिव आता है जबकि झिमली का नेगेटिव. यहीं से कहानी कई सवाल खड़े करती है और दर्शक बेचैनी के साथ आगे बढ़ता है.
मर्दानी 3 का पहला हाफ बेहद टाइट और तेज है. कहानी बिना वक्त गंवाए सीधे मुद्दे पर आती है. अपहरण, डर और असहाय बच्चों की पीड़ा को इस तरह दिखाया गया है कि कई सीन रोंगटे खड़े कर देते हैं. शिवानी की जांच और अम्मा की क्रूरता का टकराव पहले हाफ में ही दर्शकों को जकड़ लेता है.
इंटरवल के बाद फिल्म का सेकेंड हाफ मेक या ब्रेक साबित होता है. यहां कहानी और ज्यादा डार्क हो जाती है. कुछ सीन इतने असहज हैं कि कमजोर दिल वाले दर्शकों के लिए देखना मुश्किल हो सकता है. हालांकि, कुछ जगहों पर फिल्म की रफ्तार थोड़ी लड़खड़ाती है, लेकिन तनाव बना रहता है.
अभिराज मिनवाला ने मर्दानी 3 को सिर्फ क्राइम थ्रिलर नहीं रहने दिया, बल्कि उसमें हॉरर का पुट भी जोड़ा है. अंधेरे लोकेशंस, साइलेंस का इस्तेमाल और कैमरा मूवमेंट डर को और गहरा करता है. हालांकि, कुछ सीन में ओवरड्रामैटिक ट्रीटमेंट कहानी को हल्का नुकसान पहुंचाता है. रानी मुखर्जी एक बार फिर शिवानी शिवाजी रॉय के रोल में पूरी तरह फिट नजर आती हैं. उनका गुस्सा, दर्द और जिद हर सीन में साफ दिखता है. एक अनुभवी पुलिस अफसर के रूप में उनका आत्मविश्वास फिल्म की रीढ़ है.
मल्लिका प्रसाद अम्मा के किरदार में फिल्म की जान हैं. वह सिर्फ विलेन नहीं बल्कि डर का चेहरा बनकर सामने आती हैं. उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज में एक अजीब सा खौफ है, जो लंबे वक्त तक पीछा करता है. सपोर्टिंग कास्ट ने भी कहानी को मजबूती दी है और कोई भी किरदार कमजोर नहीं लगता.