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150 रुपए से बॉलीवुड में रखा कदम, पहली फिल्म में हीरो नहीं हीरोइन का निभाया किरदार! आज करोड़ों के मालिक बनें जीतू जी

बॉलीवुड में एंट्री पाने के लिए और इंडस्ट्री को अपना बनाने के लिए जीतू जी को कितनी मेहनत करनी पड़ी यह बात सिर्फ वही जानते हैं. उन्होंने यहां पैर जमाने के लिए क्या कुछ नहीं किया. आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े किस्सों के बारे में जानने के लिए.

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Edited By: Shanu Sharma
150 रुपए से बॉलीवुड में रखा कदम, पहली फिल्म में हीरो नहीं हीरोइन का निभाया किरदार! आज करोड़ों के मालिक बनें जीतू जी
Courtesy: Pinterest

बॉलीवुड में कदम जमाना कोई आसान बात नहीं है. हर कलाकार के लिए यह एक सपना होता है. हर नए कलाकार को दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है. इसके बाद भी कई बार पहली फिल्म मिलना एक किस्मत लगता है. मात्र 150 रुपये से  फिल्मों में कदम रखने वाले जितेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे एक दिन बड़े पर्दे के सितारे बनेंगे. 

7 अप्रैल 1942 को जन्मे जितेंद्र के पिता की नकली ज्वेलरी की दुकान चलाते थे. वे फिल्मों के सेट पर जाकर अपने नकली गहने बेचते थे. जिसमे छोटे जितेंद्र भी पिता का हाथ बंटाते थे और सेट पर घूमते-फिरते रहते थे. सेट को नजदीक से देखने के कारण बचपन से ही फिल्मों के प्रति गहरा शौक था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि गहनों की यह दुकान ही उन्हें सिनेमा की दुनिया में पहला कदम रखने का मौका देगी.

जीतू जी ने कैसे रखा बॉलीवुड में पहला कदम?

जितेंद्र की फिल्मी शुरुआत भले ही 'गीत गाया पत्थरों ने' से मानी जाती है, लेकिन असल कहानी 'सेहरा' फिल्म से जुड़ी है. इस फिल्म के सेट पर उन्होंने हर तरह का काम किया. आर्टिस्ट की जरूरतों का ख्याल रखना, छोटे-मोटे काम करना और भी कई काम करना. उस समय उनकी मासिक तनख्वाह केवल 150 रुपये थी. जितेंद्र, निर्देशक वी. शांताराम को प्रभावित करने के लिए जितेंद्र ने चापलूसी की सारी हदें पार कर दीं. उन्होंने खुद इस बात को स्वीकारते हुए कहा था कि सेट पर निर्देशक को खुश करने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे.

क्या है सेहरा फिल्म का पूरा किस्सा?

एक दिन फिल्म 'सेहरा' में अभिनेत्री संध्या को एक मुश्किल सीन करना था, जिसमें उन्हें ऊंट पर कूदना था. निर्देशक ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो संध्या जैसा दिखे और यह खतरनाक सीन कर सके. जितेंद्र ने वी. शांताराम को इम्प्रेस करने के लिए बिना सोचे-समझे ऊंट पर छलांग लगा दी. उन्होंने यह काम पैसे के लिए नहीं, बल्कि खुद को साबित करने के लिए किया था.

उनकी इस बहादुरी और लगन को देखकर वी. शांताराम काफी प्रभावित हुए थे. इसी लगन और साहस की बदौलत वी. शांताराम ने जितेंद्र को अपनी फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' में मुख्य भूमिका ऑफर कर दी. इस फिल्म के लिए उनकी फीस मात्र 100 रुपये तय हुई. उस दौर में कम फीस मिलने के बावजूद जितेंद्र ने कभी हार नहीं मानी. उन्होंने मेहनत और समर्पण से धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई.