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'हैवान' तो बहुत बाद में आई... 1917 से चल रहा है भारत में रीमेक का सिलसिला, ये सुपरहिट फिल्म भी हुई है कॉ

अक्षय कुमार और सैफ अली खान की 'हैवान' के रिलीज होते ही रीमेक फिल्मों को लेकर बहस तेज हो गई है. लेकिन भारत में रीमेक और रूपांतरण का इतिहास आज का नहीं है. भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में ही फिल्मों को दोबारा बनाने का सिलसिला शुरू हो चुका था.

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Edited By: Babli Rautela
'हैवान' तो बहुत बाद में आई... 1917 से चल रहा है भारत में रीमेक का सिलसिला, ये सुपरहिट फिल्म भी हुई है कॉ
Courtesy: AI

अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म 'हैवान' सिनेमाघरों में पहुंचते ही एक बार फिर बॉलीवुड और रीमेक फिल्मों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी यह फिल्म मोहनलाल स्टारर 2016 की मलयालम फिल्म 'ओप्पम' का हिंदी रीमेक है. आज के दौर में दर्शकों के लिए किसी दूसरी भाषा की फिल्म देखना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है. ओटीटी प्लेटफॉर्म, डबिंग और सबटाइटल्स की वजह से अलग-अलग भाषाओं का सिनेमा आसानी से दर्शकों तक पहुंच रहा है. ऐसे में किसी फिल्म के रीमेक होने की खबर सामने आते ही कई बार सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगते हैं.

लेकिन क्या भारत में रीमेक का चलन हाल के वर्षों की देन है. ऐसा बिल्कुल नहीं है. भारतीय सिनेमा में किसी कहानी को दोबारा पर्दे पर पेश करने की परंपरा सिनेमा के शुरुआती दौर से ही मौजूद रही है.

राजा हरिश्चंद्र से जुड़ा है शुरुआती इतिहास

भारत की पहली स्वदेशी पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म मानी जाने वाली 'राजा हरिश्चंद्र' का निर्देशन दादासाहेब फाल्के ने किया था. फिल्म 3 मई 1913 को बॉम्बे के कोरोनेशन सिनेमा में रिलीज हुई थी. फिल्म को दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली और इसे अलग-अलग जगहों पर ले जाकर प्रदर्शित किया जाने लगा. उस समय फिल्मों की प्रिंट को सुरक्षित रखना आज की तरह आसान नहीं था. बताया जाता है कि 1917 में 'राजा हरिश्चंद्र' की आखिरी बची प्रिंट को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते समय गर्मी और घर्षण के कारण आग लग गई. प्रिंट नष्ट होने के बाद दादासाहेब फाल्के ने फिल्म को दोबारा शूट किया.

इसी दोबारा बनाए गए संस्करण को 'सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र' के नाम से जाना जाता है. उपलब्ध फुटेज को लेकर फिल्म इतिहास में यह चर्चा भी मिलती है कि आज जो सामग्री बची है, वह 1913 की मूल फिल्म के बजाय बाद में दोबारा बनाई गई फिल्म से जुड़ी हो सकती है.

1917 में एक ही कहानी पर बनी दूसरी फिल्म

दिलचस्प बात यह है कि साल 1917 में ही इसी पौराणिक कहानी पर एक और फिल्म सामने आई. कलकत्ता में जे.एफ. मदन की कंपनी एल्फिंस्टन बायोस्कोप के लिए रुस्तमजी धोतीवाला ने 'सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र' नाम से फिल्म बनाई. यह फिल्म 24 मार्च 1917 को कलकत्ता के न्यू टेंट मैदान में रिलीज हुई थी. कुछ फिल्म इतिहासकार और रिकॉर्ड इसे भारतीय सिनेमा के शुरुआती आधिकारिक रीमेक के उदाहरण के तौर पर देखते हैं.

हालांकि यह फिल्म केवल फाल्के की फिल्म से प्रभावित नहीं थी. इसे उस समय के लोकप्रिय उर्दू स्टेज ड्रामा से भी प्रेरणा मिली थी. इसके प्रचार में इसे फोटोग्राफ्ड प्ले भी कहा गया था. इस तरह 1917 में एक ही पौराणिक कथा को लेकर अलग-अलग जगहों पर दो सिनेमाई प्रस्तुतियां सामने आईं.

स्टेज और साहित्य से फिल्मों तक पहुंचीं कहानियां

भारतीय सिनेमा में पुरानी कहानियों को नए अंदाज में पेश करने की परंपरा केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही. रंगमंच, लोककथाओं और साहित्य से भी कई कहानियां पर्दे तक पहुंचीं. 1931 में रिलीज हुई 'आलम आरा' को भारत की पहली बोलती फिल्म माना जाता है. यह भी एक लोकप्रिय पारसी स्टेज प्ले से प्रेरित सिनेमाई प्रस्तुति थी. यानी भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में ही यह स्पष्ट हो गया था कि थिएटर, साहित्य और पुरानी लोकप्रिय कहानियां फिल्मों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बनने वाली हैं.