इस हफ्ते चुनिंदा सिनेमाघरों में रिलीज हुई युवा डायरेक्टर निहारिका साहनी की फिल्म आत्माराम लाइव अपने अनोखे विषय के कारण चर्चा में है. पहली बार किसी फिल्म में सोशल मीडिया की दौड़ में युवाओं की रातों रात स्टार बनने की चाहत को कहानी का केंद्र बनाया गया है. यह विषय अब तक फिल्म मेकर्स अक्सर नजरअंदाज करते आए थे, लेकिन निहारिका ने इसे बड़े पर्दे पर पूरी मजबूती के साथ पेश किया है.
दिल्ली की निहारिका साहनी ने सीमित साधनों और पूरी नई कास्ट के साथ करीब ढाई घंटे की इस फिल्म को बनाया है. यह उनका पहला डायरेक्शन है और इतना बड़ा जोखिम लेकर उन्होंने जिस तरह कंटेंट पेश किया है, वह काबिलेतारीफ है.
फिल्म की कहानी एक ऐसे युवक की है जो एक छोटे गांव से बड़े शहर आता है. उसका सपना है कि सोशल मीडिया का सुपरस्टार बन जाए. पिता ने बेटे को बी टेक इसलिए कराई थी कि वह एक सुरक्षित करियर बनाए. लेकिन लड़का शहर में एक छोटे से कमरे में रहते हुए सरदार जी के बेटे के साथ सोशल मीडिया वीडियो बनाता है. कंटेंट वायरल होने का सपना लेकर वह बार बार कोशिश करता है लेकिन हर बार असफल रहता है. इसी दौरान सरदार जी के दादा जी का निधन हो जाता है और दोनों अंतिम संस्कार में शामिल होने श्मशान पहुंचते हैं.
यहीं उसे एक नया आइडिया आता है. क्यों न श्मशान की पृष्ठभूमि पर हॉरर वीडियो बनाया जाए. भूतों और रहस्यमयी घटनाओं पर आधारित कंटेंट शायद दर्शकों को आकर्षित कर दे. इसी सोच के साथ वह वीडियो बनाने लगता है लेकिन अनजाने में उसका पैर एक अधजली चिता की राख पर पड़ जाता है.
चिता की राख के कण उसके जूते में चिपक जाते हैं और इसी राख के साथ एक आत्माराम भी उसकी जिंदगी में आ जाता है. इसके बाद शुरू होता है हास्य और डर का ऐसा सिलसिला जिसमें वह और उसका दोस्त बुरी तरह उलझ जाते हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर उनके वीडियो अचानक वायरल हो जाते हैं और वह रातों रात स्टार बन जाते हैं. इसी चक्रव्यूह में एक और किरदार वैष्णवी भी फंस जाती है, जो अपनी दादी की मौत से दुखी है और भूत प्रेत से जुड़ी घटनाओं का शिकार बनने लगती है.
निहारिका साहनी ने अपनी फिल्म में सोशल मीडिया की दुनिया को बेहद यथार्थवादी अंदाज में पेश किया है. आज के युवा हर समय ऑनलाइन रहने और लाइक्स फॉलोअर्स पाने की होड़ में लगे रहते हैं. फिल्म इसी ट्रेंड पर हल्का सा व्यंग्य करती है.
कई संवाद दर्शकों को हंसाते हैं, जबकि कुछ गहरे विचार छोड़ जाते हैं. फिल्म यह बताती है कि नाम और पहचान पाने के चक्कर में युवा किस हद तक जा सकते हैं, और कैसे यह दुनिया उनकी असल जिंदगी को प्रभावित करती है.