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India Daily

RBI का बड़ा दांव! क्या 2013 की तरह फिर आएंगे अरबों डॉलर? NRI निवेशकों के लिए हो सकता है बड़ा मौका

आरबीआई (RBI) की नई योजना के तहत प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करने के लिए हेजिंग खर्च खुद उठाने का फैसला किया गया है. विशेषज्ञों के अनुसार इस योजना की असली सफलता 'लीवरेज' की अनुमति देने पर निर्भर करेगी.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
RBI का बड़ा दांव! क्या 2013 की तरह फिर आएंगे अरबों डॉलर? NRI निवेशकों के लिए हो सकता है बड़ा मौका
Courtesy: ai generated

मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 'फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट' डिपॉजिट योजना को दोबारा बढ़ावा देने के फैसले ने बैंकिंग सेक्टर में हलचल मचा दी है. जानकारों का मानना है कि इस योजना से प्रवासी भारतीयों यानी कि एनआरआई के जरिए अरबों डॉलर भारत आ सकते हैं. लेकिन इसकी सफलता एक बड़े सवाल पर टिकी है. क्या आरबीआई इस बार भी निवेशकों को 'लीवरेज' यानी की उधार लेकर निवेश करने की अनुमति देगा जिसने 2013 में इस योजना को सुपरहिट बनाया था?

आरबीआई ने इस बार नए FCNR डिपॉजिट पर आने वाली 'हेजिंग कॉस्ट' यानी कि करेंसी के उतार-चढ़ाव से बचने का खर्च को खुद उठाने का फैसला किया है. आमतौर पर बैंकों को इसके लिए 3% से 3.5% तक खर्च करना पड़ता है. अब जब आरबीआई यह खर्च उठा रहा है तो बैंक प्रवासी भारतीयों को ज्यादा ब्याज दे पाएंगे.

अभी FCNR डिपॉजिट पर करीब 3.5% से 4% का रिटर्न मिलता है. आरबीआई की मदद के बाद बैंक इसे बढ़ाकर 6% से 6.5% कर सकते हैं. हालांकि यह रिटर्न अच्छा है लेकिन कुछ बैंकर्स का मानना है कि सिर्फ इतने भर से बहुत बड़ा विदेशी फंड भारत नहीं आने वाला.

असली खेल है 'लीवरेज' का

साल 2013 की योजना में असली गेम चेंजर 'लीवरेज' ही था. तब अमीर प्रवासियों ने विदेशी बैंकों से पैसा उधार लिया और उसमें अपनी थोड़ी रकम मिलाकर बड़ा निवेश किया. भारतीय बैंकों ने भी 'स्टैंडबाय लेटर्स ऑफ क्रेडिट' देकर विदेशी कर्जदाताओं का जोखिम कम किया जिससे लोन मिलना आसान हो गया. इस तरीके से निवेशकों ने अपनी असली पूंजी से कई गुना बड़ा FCNR डिपॉजिट तैयार कर लिया. उदाहरण के लिए अगर किसी NRI ने अपने 1 लाख डॉलर लगाए तो उसने उधार के पैसे मिलाकर 10 लाख डॉलर से भी बड़ा डिपॉजिट खड़ा कर लिया.

2013 में इस तरीके से बंपर मुनाफा हुआ था क्योंकि तब भारत में ब्याज दरें बहुत ऊंची थीं और विदेशों में कर्ज बहुत सस्ता था. कुछ अनुमानों के मुताबिक इस जुगाड़ से निवेशकों को अपनी खुद की पूंजी पर सालाना 45% से 85% तक का तगड़ा रिटर्न मिला था. लेकिन आज हालात बदल चुके हैं.

2013 और आज के माहौल में जमीन-आसमान का अंतर है-

ब्याज दरों का घटता अंतर- 2013 में भारत के सरकारी बॉन्ड पर 9% से ज्यादा रिटर्न था जबकि अमेरिकी बॉन्ड पर यह 1% से भी कम था. आज यह अंतर घटकर सिर्फ 2.4% के आसपास रह गया है. इसलिए अब पुराना तरीका उतना फायदेमंद नहीं रहा.

अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें- अगर अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो बिना उधार वाले डॉलर को भारत में जमा करने का आकर्षण और कम हो जाएगा.

2013 का वो जादुई आंकड़ा

इन्हीं बदलते हालातों के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना को कामयाब बनाने के लिए 'लीवरेज' देना बेहद जरूरी है. 2013 में इसी उधारी के दम पर बैंकों ने FCNR डिपॉजिट के जरिए करीब 26 अरब डॉलर और विदेशी कर्ज के माध्यम से 8 अरब डॉलर जुटाए थे जिससे कुल 34 अरब डॉलर भारत आए थे. इसमें एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई जैसे बड़े बैंकों ने सबसे ज्यादा योगदान दिया था.

अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि आरबीआई इस बार लीवरेज की मंजूरी देता है या नहीं. अगर मंजूरी मिली तो अमीर प्रवासियों का बड़ा पैसा भारत आएगा नहीं तो कड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच यह स्कीम महज एक सामान्य निवेश विकल्प बनकर रह जाएगी.