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'6 महीने तक नहीं मिलेगी राहत!' ईरान-US समझौते के बाद भी पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर बनी रहेगी टेंशन

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते से वैश्विक तेल बाजार को राहत मिली है लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर इसका सकारात्मक असर तुरंत नहीं दिखेगा. विशेषज्ञों के अनुसार स्थिति सामान्य होने में छह महीने तक लग सकते हैं.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
'6 महीने तक नहीं मिलेगी राहत!' ईरान-US समझौते के बाद भी पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर बनी रहेगी टेंशन
Courtesy: ai generated

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया समझौते ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में राहत का माहौल बनाया है. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है और निवेशकों का भरोसा भी लौटा है. इसके बावजूद भारत के लिए चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि तेल आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को सामान्य होने में समय लगेगा. ऐसे में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर राहत का असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा.

तेल बाजार में राहत, लेकिन इंतजार बाकी

अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ है. इससे बड़े स्तर पर युद्ध की आशंकाएं घटी हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति को लेकर भरोसा बढ़ा है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल समझौता हो जाना पर्याप्त नहीं होता. तेल परिवहन, बीमा व्यवस्था, सप्लाई अनुबंध और लॉजिस्टिक नेटवर्क को पूरी तरह सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगता है. इसी कारण बाजार में आई नरमी का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने में कुछ महीने लग सकते हैं.

भारत की ऊर्जा निर्भरता बढ़ा रही चिंता

भारत अपनी कुल जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाला हर उतार-चढ़ाव सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर आयात लागत बढ़ती है और इसका असर सरकारी खर्च तथा व्यापार संतुलन पर भी दिखाई देता है. समझौते से जोखिम जरूर कम हुआ है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए अभी भी सतर्क रहने की जरूरत है. भारत जैसे देशों पर वैश्विक बाजार की अस्थिरता का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है.

रुपया और महंगाई पर बनी रहेगी नजर

कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने से भारतीय रुपये को कुछ मजबूती मिल सकती है और आयात बिल भी कम हो सकता है. लेकिन आर्थिक जानकारों का कहना है कि स्थिति पूरी तरह स्थिर होने तक जोखिम समाप्त नहीं माना जा सकता. तेल की कीमतें केवल पेट्रोल और डीजल को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि परिवहन, उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर भी असर डालती हैं. यही कारण है कि ऊर्जा बाजार में किसी भी प्रकार की अस्थिरता महंगाई के स्तर को प्रभावित कर सकती है और आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ा सकती है.

एल नीनो और समझौते की सफलता पर टिकी उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौता अभी शुरुआती चरण में है और इसकी सफलता आगे की प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी. यदि बातचीत सुचारु रूप से आगे बढ़ती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है. दूसरी ओर, मौसम संबंधी चुनौतियां भी भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं. एल नीनो की स्थिति मजबूत होने पर खाद्य महंगाई बढ़ सकती है. ऐसे में ऊर्जा और खाद्य कीमतों का संयुक्त प्रभाव आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है. इसलिए आम लोगों को राहत मिलने में अभी कुछ समय लगने की संभावना है.