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India Daily

दिल्ली-मुंबई को भी पीछे छोड़ रहा ये शहर, यहां लोग करते हैं सबसे ज्यादा घर खर्च

सूरत भारत के तेजी से बढ़ते कंजम्पशन मार्केट के रूप में उभर रहा है. करीब 34 अरब डॉलर के कंजम्पशन मार्केट के साथ यह छह बड़े महानगरों के बाहर देश का सबसे बड़ा बाजार है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
दिल्ली-मुंबई को भी पीछे छोड़ रहा ये शहर, यहां लोग करते हैं सबसे ज्यादा घर खर्च
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: भारत में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शहरों की बात होती है तो आमतौर पर मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों का नाम सामने आता है. लेकिन देश के बदलते कंजम्पशन पैटर्न में सूरत तेजी से अपनी अलग पहचान बना रहा है. महानगरों से बाहर होने के बावजूद सूरत का घरेलू खर्च और कंजम्पशन मार्केट कई बड़े शहरों को पीछे छोड़ रहा है.

'The Many Urban Indias' रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत भारत के टॉप कंजम्पशन मार्केट्स में सातवें स्थान पर है. देश के छह बड़े महानगरों से बाहर यह सबसे बड़ा कंजम्पशन मार्केट है. सूरत का कंजम्पशन मार्केट करीब 34 अरब डॉलर का है, जो अहमदाबाद और पुणे से भी ज्यादा है. रिपोर्ट के अनुसार, सूरत में प्रति परिवार औसत खपत बेंगलुरु से भी अधिक है.

शहरों में कुल घरेलू खपत 

देश के 100 शहरों में कुल घरेलू खपत करीब 844 अरब डॉलर यानी 74.5 लाख करोड़ रुपये है. इनमें से छह बड़े महानगर कुल खपत का करीब 46 फीसदी हिस्सा रखते हैं. हालांकि, सूरत जैसे शहर यह संकेत दे रहे हैं कि भारत में उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता अब केवल पारंपरिक महानगरों तक सीमित नहीं है.

रिपोर्ट में सूरत को 'बूमटाउन' शहरों की श्रेणी में रखा गया है. इस समूह में पुणे, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, इंदौर, कोयंबटूर और वडोदरा जैसे तेजी से बढ़ते शहर शामिल हैं. इन शहरों में आबादी के साथ प्रति परिवार खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है.

सूरत की खासियत

सूरत की खासियत सिर्फ इसकी बड़ी आबादी नहीं है. शहर में मध्यम और उच्च आय वाले परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. टेक्सटाइल उद्योग, डायमंड कारोबार और प्रवासी आबादी की बेहतर होती आर्थिक स्थिति ने यहां आय और खर्च दोनों को बढ़ाया है. सूरत की औसत घरेलू आय हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों से ज्यादा बताई गई है.

रिपोर्ट में क्या आया सामने?

शहरी भारत में मध्यम आय वर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार टॉप 100 शहरों में 6 लाख से 36 लाख रुपये सालाना कमाने वाले परिवारों की हिस्सेदारी पिछले एक दशक में 29 फीसदी से बढ़कर 53 फीसदी हो गई है. 2030-31 तक इसके 60 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं 36 लाख रुपये से ज्यादा सालाना कमाने वाले उच्च आय वर्ग की हिस्सेदारी 3 फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी हो गई है.