कैंची और ब्लेड नहीं... हाथों से उखाड़े जाते हैं सिर और दाढ़ी के बाल, जानें क्या है कठिन 'केशलोचन' परंपरा
केशलोचन जैन साधु-साध्वियों की महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसमें सिर और चेहरे के बाल हाथों से उखाड़े जाते हैं. इसे त्याग, वैराग्य, अहिंसा और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है. कैंची या ब्लेड का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
नई दिल्ली: पर्युषण पर्व जैन धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है. इस दौरान त्याग, तप, संयम और आत्मचिंतन पर विशेष जोर दिया जाता है. जैन साधु और साध्वियों का जीवन भी इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित माना जाता है. उनकी कठिन साधनाओं में केशलोचन की परंपरा का विशेष महत्व है. इसमें सिर और चेहरे के बाल कैंची या ब्लेड से काटने के बजाय हाथों से उखाड़े जाते हैं.
केशलोचन को केश लुंचन भी कहा जाता है. इसका शाब्दिक अर्थ बालों को उखाड़ना है. जैन परंपरा में इसे केवल बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं माना जाता, बल्कि त्याग और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है. जब कोई व्यक्ति सांसारिक जीवन छोड़कर साधु या साध्वी के रूप में दीक्षा लेता है, तब केशलोचन का विशेष महत्व होता है.
जैन दर्शन से जुड़ी मान्यताएं
बालों को कैंची या ब्लेड से काटने के बजाय हाथों से उखाड़ने के पीछे जैन दर्शन से जुड़ी मान्यताएं हैं. जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है. परंपरागत मान्यता के अनुसार, औजारों के इस्तेमाल से सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो सकती है. इसके अलावा बालों और शरीर की सुंदरता के प्रति लगाव को सांसारिक मोह का हिस्सा माना जाता है. इसलिए बालों को हाथों से हटाना शरीर और बाहरी रूप के प्रति मोह को कम करने का प्रतीक माना जाता है.
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केशलोचन की प्रक्रिया
केशलोचन की प्रक्रिया आसान नहीं होती. बालों को जड़ से हटाने के कारण दर्द होना स्वाभाविक है. जैन साधु इसे धैर्य और सहनशीलता के साथ पूरा करते हैं. जैन साधना में शारीरिक सुख और असुविधा से ऊपर उठकर मन को संयमित रखने पर जोर दिया जाता है. इसी वजह से केशलोचन को सहनशीलता और आत्मसंयम की साधना के रूप में भी देखा जाता है.
दीक्षा के समय इसका महत्व
दीक्षा के समय इसका महत्व और बढ़ जाता है. सांसारिक जीवन छोड़ने वाला व्यक्ति अपने पुराने जीवन, सुविधाओं और भौतिक आकर्षण से दूरी बनाने का संकल्प लेता है. केशलोचन इसी संकल्प का बाहरी प्रतीक माना जाता है. इसका संदेश है कि साधु जीवन में शरीर की सुंदरता और आराम से ज्यादा महत्व आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का है.
क्या है परंपरा?
परंपरा के अनुसार केशलोचन धार्मिक वातावरण में किया जाता है. साधु या साध्वी अपने बालों को हाथों से हटाते हैं. कुछ परंपराओं में वरिष्ठ साधु भी सहायता करते हैं. इस दौरान धार्मिक मंत्रों और वचनों का पाठ किया जा सकता है. प्रक्रिया पूरी होने के बाद साधु अपनी साधना और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं.
जैन परंपराओं में केशलोचन की आवृत्ति अलग हो सकती है और इसे सामान्य तौर पर साल में एक या दो बार किए जाने की परंपरा बताई जाती है. हालांकि अलग-अलग जैन संप्रदायों में इसकी विधि और समय में अंतर हो सकता है. बाहर से देखने पर केशलोचन बेहद कठिन और दर्दनाक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जैन दर्शन में इसका अर्थ शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक व्यापक है. यह त्याग, वैराग्य, अहिंसा, धैर्य और आत्मअनुशासन की भावना से जुड़ी साधना है.