पूजा-पाठ केवल श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा में इसे विधि-विधान के साथ करने की भी परंपरा रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजन सामग्री का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है, जितना कि मन की भक्ति. अक्सर लोग अनजाने में ऐसी वस्तुएं भी पूजा की थाली में रख देते हैं, जिन्हें किसी विशेष देवी-देवता की आराधना में वर्जित माना गया है. ऐसे में यह जानना उपयोगी है कि अलग-अलग देवताओं की पूजा में कौन-सी सामग्री नहीं चढ़ाई जाती और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है.
भगवान विष्णु की आराधना में साबुत और स्वच्छ अक्षत चढ़ाने की परंपरा है. टूटे हुए चावल यानी खंडित अक्षत अर्पित करना शुभ नहीं माना जाता. इसके अलावा आक और धतूरा भी विष्णु पूजा में प्रयोग नहीं किए जाते. धार्मिक मान्यता है कि ये दोनों सामग्री भगवान शिव को अधिक प्रिय हैं. विष्णु पूजा में तुलसी दल, पीले पुष्प और शुद्ध अक्षत का उपयोग विशेष महत्व रखता है.
भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र, धतूरा और आक का विशेष स्थान है, लेकिन केतकी का फूल अर्पित नहीं किया जाता. पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता विवाद के समय केतकी के फूल ने असत्य का साथ दिया था. इसी कारण भगवान शिव ने उसे अपनी पूजा में स्वीकार नहीं किया. तभी से शिवलिंग पर केतकी का फूल चढ़ाने की परंपरा नहीं है.
तुलसी को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है, लेकिन भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल अर्पित करने से परहेज किया जाता है. धार्मिक कथा के अनुसार तुलसी और गणेश जी से जुड़ी एक घटना के कारण यह परंपरा बनी. इसलिए गणेश पूजा में तुलसी के स्थान पर अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है.
देवी दुर्गा की पूजा में हमेशा ताजे और स्वच्छ फल अर्पित करने की परंपरा है. बासी, कटे हुए या खराब फल चढ़ाना उचित नहीं माना जाता. वहीं सूर्य देव की उपासना में लाल पुष्प, जल, गुड़ और गेहूं का विशेष महत्व है. बिल्व पत्र भगवान शिव से जुड़ा माना जाता है, इसलिए सूर्य पूजा में इसका प्रयोग नहीं किया जाता.
धार्मिक ग्रंथों में पूजन सामग्री से जुड़े कई नियम बताए गए हैं, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है. ऐसे में किसी विशेष व्रत या अनुष्ठान के समय स्थानीय परंपरा या जानकार विद्वान की सलाह लेना उचित माना जाता है. श्रद्धा के साथ शास्त्रों में वर्णित पूजन विधि का पालन करने से पूजा अधिक व्यवस्थित और परंपरा के अनुरूप मानी जाती है.
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